तत्राभिषेकप्रयता वसन्ती
प्रयुक्तपूजा विधिनातिथिभ्यः ।
वन्येन सा वल्कलिनी शरीरं
पत्युः प्रजासंततये बभार ॥

अन्वयः AI तत्र वसन्ती, अभिषेकप्रयता, वल्कलिनी सा विधिना अतिथिभ्यः प्रयुक्तपूजा सती पत्युः प्रजासंततये वन्येन शरीरं बभार।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) तत्रेति॥ तत्राश्रमेऽभिषेकेण स्नानेन प्रयता नियता वसन्ती विधइना शास्त्रेणातिथिभ्यः प्रयुक्तपूजा कृतसत्कारा वल्कलिनी सा सीता पत्युः प्रजासंततये संतानाविच्छेदाय हेतोः। वन्येन कन्दमूलादिना शरीरं बभार पुपोष ॥
Summary AI Residing there, purified by daily ablutions and wearing bark garments, Sita duly offered worship to guests. She sustained her body with forest produce for the sake of continuing her husband's lineage.
सारांश AI वहां स्नान और अतिथियों के सत्कार के नियमों का पालन करते हुए, वल्कलधारिणी सीता ने पति की संतान की रक्षा हेतु वन के कंद-मूल से अपने शरीर का पोषण किया।
पदच्छेदः AI
तत्रतत्र There
अभिषेकप्रयताअभिषेकप्रयत (प्र√यम्+क्त, १.१) purified by ablutions
वसन्तीवसन्ती (√वस्+शतृ, १.१) residing
प्रयुक्तपूजाप्रयुक्त (प्र√युज्+क्त)पूजा (१.१) she who had offered worship
विधिनाविधि (३.१) according to rule
अतिथिभ्यःअतिथि (४.३) to the guests
वन्येनवन्य (३.१) with forest-produce
सातद् (१.१) she
वल्कलिनीवल्कलिन (१.१) wearing bark-garments
शरीरम्शरीर (२.१) body
पत्युःपति (६.१) of her husband
प्रजासंततयेप्रजासंतति (४.१) for the continuation of the lineage
बभारबभार (√भृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) she bore
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
त्रा भि षे प्र ता न्ती
प्र यु क्त पू जा वि धि ना ति थि भ्यः
न्ये सा ल्क लि नी री रं
त्युः प्र जा सं ये भा
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