जाने विसृष्टां प्रणिधानतस्त्वां
मिथ्यापवादक्षुभितेन भर्त्रा ।
तन्मा व्यथिष्ठा विषयान्तरस्थं
प्राप्तासि वैदेहि पितुर्निकेतम् ॥
जाने विसृष्टां प्रणिधानतस्त्वां
मिथ्यापवादक्षुभितेन भर्त्रा ।
तन्मा व्यथिष्ठा विषयान्तरस्थं
प्राप्तासि वैदेहि पितुर्निकेतम् ॥
मिथ्यापवादक्षुभितेन भर्त्रा ।
तन्मा व्यथिष्ठा विषयान्तरस्थं
प्राप्तासि वैदेहि पितुर्निकेतम् ॥
अन्वयः
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वैदेहि! मिथ्यापवादक्षुभितेन भर्त्रा विसृष्टाम् त्वाम् प्रणिधानतः जाने। तत् मा व्यथिष्ठाः। (त्वम्) विषयान्तरस्थम् पितुः निकेतम् प्राप्ता असि।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
जान इति॥ त्वां मिथ्यापवादेन क्षुभितेन भर्त्रा विसृष्टां त्यक्तां प्रणिधानतः समाधिदृष्ट्या जाने। हे वैदेहि! विषयान्तरस्थं देशान्तरस्थं पितुर्जनकस्यैव निकेतं गृहं प्राप्तासि। तत्तस्मान्मा व्यथिष्ठा मा शोचीः। व्यथेर्लुङ्।
न माङ्योगे (अष्टाध्यायी ६.४.७४ ) इत्यडागमप्रतिषेधधः। भर्त्रोपेक्षितानां पितृगृहवास एवोचित इति भावः ॥
Summary
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"O Vaidehi, through my meditative insight, I know that you were abandoned by your husband, who was agitated by false slander. Therefore, do not be distressed. You have reached a father's home, though it is in a different region."
सारांश
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वाल्मीकि ने कहा—मैं अपनी अंतर्दृष्टि से जानता हूँ कि तुम्हारे पति ने मिथ्या कलंक के कारण तुम्हें त्यागा है; यहाँ तुम स्वयं को अपने पिता के घर में ही समझो।
पदच्छेदः
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| जाने | जाने (√ज्ञा कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I know |
| विसृष्टाम् | विसृष्ट (वि√सृज्+क्त, २.१) | abandoned |
| प्रणिधानतः | प्रणिधान (+तसिल्) | through meditation |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| मिथ्यापवादक्षुभितेन | मिथ्यापवाद–क्षुभित (३.१) | by him who was agitated by false slander |
| भर्त्रा | भर्तृ (३.१) | by your husband |
| तत् | तत् | therefore |
| मा | मा | do not |
| व्यथिष्ठाः | व्यथिष्ठाः (√व्यथ् कर्तरि लुङ् (आत्मने.) म.पु. एक.) | be distressed |
| विषयान्तरस्थम् | विषयान्तर–स्थ (२.१) | situated in another region |
| प्राप्ता | प्राप्त (प्र√आप्+क्त, १.१) | have reached |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| वैदेहि | वैदेही (८.१) | O Vaidehi |
| पितुः | पितृ (६.१) | of a father |
| निकेतम् | निकेत (२.१) | home |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जा | ने | वि | सृ | ष्टां | प्र | णि | धा | न | त | स्त्वां |
| मि | थ्या | प | वा | द | क्षु | भि | ते | न | भ | र्त्रा |
| त | न्मा | व्य | थि | ष्ठा | वि | ष | या | न्त | र | स्थं |
| प्रा | प्ता | सि | वै | दे | हि | पि | तु | र्नि | के | तम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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