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निशाचरोपप्लुतभर्तृकाणां
तपस्विनीनां भवतः प्रसादात् ।
भूत्वा शरण्या शरणार्थमन्यं
कथं प्रपत्स्ये त्वयि दीप्यमाने ॥

अन्वयः AI भवतः प्रसादात् निशाचरोपप्लुतभर्तृकाणाम् तपस्विनीनाम् शरण्या भूत्वा, त्वयि दीप्यमाने (सति) अहम् शरणार्थम् अन्यम् कथम् प्रपत्स्ये?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) निशाचरेति॥ निशाचरैरुपप्लुताः पीडिता भर्तारो यासां ता निशाचरोपप्लुतभर्तृकाः। नद्यृतश्च (अष्टाध्यायी ५.४.१५३ ) इति कप्प्रत्ययः। तासां तपस्विनीनां भवतः प्रसादादनुग्रहाच्छरण्या शरणसमर्था भूत्वा। अद्य त्वयि दीप्यमाने प्रकाशमाने सत्येव शरणार्थमन्यं तपस्विनं कथं प्रपत्स्ये प्राप्स्यामि? ॥
Summary AI "By your grace, I became a refuge for the ascetic women whose husbands were tormented by demons. Having been their protector, how can I now seek refuge in another, while you, my protector, are still reigning gloriously?"
सारांश AI आपके संरक्षण में मैंने उन तपस्विनियों की रक्षा की थी जिनके पति राक्षसों से पीड़ित थे; अब आपके राजा रहते हुए मैं स्वयं किसी अन्य की शरण में कैसे जा सकती हूँ?
पदच्छेदः AI
निशाचरोपप्लुतभर्तृकाणाम्निशाचरउपप्लुत–भर्तृका (६.३) of those whose husbands were tormented by demons
तपस्विनीनाम्तपस्विनी (६.३) of the female ascetics
भवतःभवत् (६.१) your
प्रसादात्प्रसाद (५.१) by the grace
भूत्वाभूत्वा (√भू+क्त्वा) having become
शरण्याशरण्या (१.१) a refuge
शरणार्थम्शरणार्थम् for refuge
अन्यम्अन्य (२.१) another
कथम्कथम् how
प्रपत्स्येप्रपत्स्ये (प्र√पद् कर्तरि लृट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) shall I seek refuge
त्वयियुष्मद् (७.१) while you
दीप्यमानेदीप्यमान (√दीप्+शानच्, ७.१) are reigning
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
नि शा रो प्लु र्तृ का णां
स्वि नी नां तः प्र सा दात्
भू त्वा ण्या णा र्थ न्यं
थं प्र त्स्ये त्व यि दी प्य मा ने
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