रक्षोवधान्तो न च मे प्रयासो
व्यर्थः स वैरप्रतिमोचनाय ।
अमर्षणः शोणितकाङ्क्षया किं
पदा स्पृशन्तं दशति द्विजिह्वः ॥

अन्वयः AI सः मे प्रयासः रक्षः-वध-अन्तः न (अस्ति), च वैर-प्रतिमोचनाय व्यर्थः न (अस्ति)। अमर्षणः द्विजिह्वः पदा स्पृशन्तम् शोणित-काङ्क्षया किम् दशति?
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) रक्ष इति॥ किंच, मे रक्षोवधान्तः प्रयासो व्यर्थो न। किंतु स वैरप्रतिमोचनाय वैरशोधनाय। तथा हि-अमर्षणोऽसहनो द्विजिह्वः सर्पः पदा पादेन स्पृशन्तं पुरुषं शोणितकाङ्क्षया दशति किम्? किंतु वैरनिर्यातनायेत्यर्थः ॥
Summary AI Rama justifies his harsh decision, saying his effort did not end with Ravana's death, nor is it futile for requiting enmity. He asks rhetorically if an angry snake bites someone stepping on it out of a desire for blood, implying it is an act of intolerance, not malice, similar to his own action against slander.
सारांश AI श्रीराम कहते हैं कि राक्षसों के वध हेतु मेरा प्रयास शत्रुता के प्रतिशोध के लिए व्यर्थ नहीं था। क्या क्रोधित सर्प केवल रक्त की लालसा में पैर से छूने वाले को डसता है? वह तो प्रतिशोध स्वरूप डसता है।
पदच्छेदः AI
रक्षोवधान्तःरक्षस्वधअन्त (१.१) ending with the killing of the demon
not
and
मेअस्मद् (६.१) my
प्रयासःप्रयास (१.१) effort
व्यर्थःव्यर्थ (१.१) futile
सःतद् (१.१) that
वैरप्रतिमोचनायवैरप्रतिमोचन (४.१) for the requital of enmity
अमर्षणःअमर्षण (१.१) intolerant
शोणितकाङ्क्षयाशोणितकाङ्क्षा (३.१) out of a desire for blood
किम्किम् (interrogative particle)
पदापद (३.१) with the foot
स्पृशन्तंस्पृशत् (√स्पृश्+शतृ, २.१) the one touching
दशतिदशति (√दंश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) bites
द्विजिह्वःद्विजिह्व (१.१) snake
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
क्षो धा न्तो मे प्र या सो
व्य र्थः वै प्र ति मो ना
र्ष णः शो णि का ङ्क्ष या किं
दा स्पृ न्तं ति द्वि जि ह्वः
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