स संनिपात्यावरजान्हतौजा-
स्तद्विक्रियादर्शनलुप्तहर्षान् ।
कौलीनमात्माश्रयमाचचक्षे
तेभ्यः पुनश्चेदमुवाच वाक्यम् ॥
स संनिपात्यावरजान्हतौजा-
स्तद्विक्रियादर्शनलुप्तहर्षान् ।
कौलीनमात्माश्रयमाचचक्षे
तेभ्यः पुनश्चेदमुवाच वाक्यम् ॥
स्तद्विक्रियादर्शनलुप्तहर्षान् ।
कौलीनमात्माश्रयमाचचक्षे
तेभ्यः पुनश्चेदमुवाच वाक्यम् ॥
अन्वयः
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हत-ओजाः सः तत्-विक्रिया-दर्शन-लुप्त-हर्षान् अवरजान् संनिपात्य तेभ्यः आत्म-आश्रयम् कौलीनम् आचचक्षे, पुनः च इदम् वाक्यम् उवाच।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
स इति॥ हतौजा निस्तेजस्कः स रामस्तस्य रामस्य विक्रियादर्शनेन लुप्तहर्षानवरजान् संनिपात्य संगमय्य। आत्माश्रयं स्वविषयकं कौलीनं निन्दां तेभ्य आचचक्षे। पुनरिदं वाक्यमुवाच ॥
Summary
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His vigor diminished, he summoned his younger brothers, whose joy had vanished upon seeing his distress. He related to them the scandal concerning himself and then spoke these words.
सारांश
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अत्यंत दुखी राम ने अपने भाइयों को बुलाया और स्वयं से जुड़ी लोकनिंदा के विषय में बताते हुए गंभीर वचन कहे।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | He |
| संनिपात्य | संनिपात्य (सम्+नि√पत्+णिच्+ल्यप्) | having assembled |
| अवरजान् | अवरज (२.३) | his younger brothers |
| हतौजाः | हत–ओजस् (१.१) | his vigor diminished |
| तद्विक्रियादर्शनलुप्तहर्षान् | तद्–विक्रिया–दर्शन–लुप्त–हर्ष (२.३) | whose joy was lost on seeing his distress |
| कौलीनम् | कौलीन (२.१) | the scandal |
| आत्माश्रयम् | आत्मन्–आश्रय (२.१) | concerning himself |
| आचचक्षे | आचचक्षे (आ√चक्ष् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | related |
| तेभ्यः | तद् (४.३) | to them |
| पुनः | पुनर् | again |
| च | च | and |
| इदम् | इदम् (२.१) | this |
| उवाच | उवाच (√वच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) | sentence |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | सं | नि | पा | त्या | व | र | जा | न्ह | तौ | जा |
| स्त | द्वि | क्रि | या | द | र्श | न | लु | प्त | ह | र्षान् |
| कौ | ली | न | मा | त्मा | श्र | य | मा | च | च | क्षे |
| ते | भ्यः | पु | न | श्चे | द | मु | वा | च | वा | क्यम् |
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