अन्वयः
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कलत्र-निन्दा-गुरुणा कीर्ति-विपर्ययेण एवम् अभ्याहतम् वैदेहि-बन्धोः हृदयम्, अयोघनेन अभितप्तम् अयः इव, किल विदद्रे।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
कलत्रेति॥ एवं किल कलत्रनिन्दया गुरुणा दुर्वहेण कीर्तिविपर्ययेणापकीर्त्याऽभ्याहतं वैदेहिबन्धोर्वैदेहिवल्लभस्य!
ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम् (अष्टाध्यायी ६.३.६७ ) इति ह्रस्वः। कालिदास इतिवत्। हृदयम्। अयोनेनाभितप्तं संतप्तमय इव। विदद्रे विदीर्णम्। कर्तरि लिट् ॥
Summary
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Thus struck by the reversal of his fame, which was heavy with the censure of his wife, the heart of Vaidehi's husband (Rama) shattered, indeed, like heated iron struck by a hammer.
सारांश
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पत्नी की निंदा और अपयश के प्रहार से राम का हृदय वैसे ही विदीर्ण हो गया जैसे अग्नि में तपा हुआ लोहा हथौड़े की चोट से चोटिल हो जाता है।
पदच्छेदः
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| कलत्रनिन्दागुरुणा | कलत्र–निन्दा–गुरु (३.१) | heavy with the censure of his wife |
| किल | किल | indeed |
| एवम् | एवम् | thus |
| अभ्याहतम् | अभ्याहत (अभि+आ√हन्+क्त, १.१) | struck |
| कीर्तिविपर्ययेण | कीर्ति–विपर्यय (३.१) | by the reversal of fame |
| अयोघनेन | अयोघन (३.१) | by a hammer |
| अयः | अयस् (१.१) | iron |
| इव | इव | like |
| अभितप्तम् | अभितप्त (अभि√तप्+क्त, १.१) | heated |
| वैदेहिबन्धोः | वैदेहि–बन्धु (६.१) | of Vaidehi's kinsman (Rama) |
| हृदयम् | हृदय (१.१) | the heart |
| विदद्रे | विदद्रे (वि√दृ भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was shattered |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | ल | त्र | नि | न्दा | गु | रु | णा | कि | लै | व |
| म | भ्या | ह | तं | की | र्ति | वि | प | र्य | ये | ण |
| अ | यो | घ | ने | ना | य | इ | वा | भि | त | प्तं |
| वै | दे | हि | ब | न्धो | र्हृ | द | यं | वि | द | द्रे |
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