उभावुभाभ्यां प्रणतौ हतारी
यथाक्रमं विक्रमशोभिनौ तौ ।
विस्पष्टमस्नान्धतया न दृष्टौ
ज्ञातौ सुतस्पर्शसुखोपलम्भात् ॥

अन्वयः AI उभौ, हत-अरी, विक्रम-शोभिनौ तौ (दाशरथी) यथाक्रमम् उभाभ्याम् (जननीभ्याम्) प्रणतौ। (तौ) अस्न-अन्धतया विस्पष्टं न दृष्टौ, (किन्तु) सुत-स्पर्श-सुख-उपलम्भात् ज्ञातौ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) उभाविति॥ यथाक्रमं स्वस्वमातृपूर्वकं प्रणतौ नमस्कृतवन्तौ हतारी हतशत्रुकौ विक्रमशोभिनौ तावुभौ रामलक्ष्मणौ। उभाभ्यां मातृभ्यामस्नैरश्रुभिरन्थतया हेतुना। अस्रमश्रु च शोणितम् इति यादवः। विस्पष्टं न दृष्टौ किंतु सुतस्पर्शेन यत् सुखं तस्योपलम्भादनुभवाज्ज्ञातौ ॥
Summary AI Those two valiant princes, shining with valor after having slain their enemies, bowed down to their two mothers in turn. Blinded by tears, the mothers could not see them clearly but recognized them from the joy of their sons' touch.
सारांश AI शत्रुओं का नाश करने वाले पराक्रमी राम और लक्ष्मण ने माताओं को प्रणाम किया। आंसुओं से धुंधली आँखों वाली माताओं ने उन्हें देखा नहीं, पर स्पर्श सुख से पहचान लिया।
पदच्छेदः AI
उभौउभ (१.२) Both
उभाभ्यांउभ (३.२) by both
प्रणतौप्रणत (प्र√नम्+क्त, १.२) bowed down
हतारीहत (√हत+क्त)अरि (१.२) who had slain their enemies
यथाक्रमंयथाक्रमम् in order
विक्रमशोभिनौविक्रमशोभिन् (१.२) shining with valor
तौतद् (१.२) they two
विस्पष्टंविस्पष्टम् clearly
अस्नान्धतयाअश्रुअन्धता (३.१) due to blindness from tears
not
दृष्टौदृष्ट (√दृश्+क्त, १.२) seen
ज्ञातौज्ञात (√ज्ञा+क्त, १.२) recognized
सुतस्पर्शसुखोपलम्भात्सुतस्पर्शसुखउपलम्भ (५.१) from perceiving the joy of their sons' touch
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
भा वु भा भ्यां प्र तौ ता री
था क्र मं वि क्र शो भि नौ तौ
वि स्प ष्ट स्ना न्ध या दृ ष्टौ
ज्ञा तौ सु स्प र्श सु खो म्भात्
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