स्फुरत्प्रभामण्डलमानसूयं
सा ब्रिभ्रती शाश्वतमङ्गरागम् ।
रराज शुद्धेति पुनः स्वपुर्यै
संदर्शिता वह्निगतेव भर्त्रा ॥

अन्वयः AI आनसूयम्, शाश्वतम् अङ्ग-रागम्, स्फुरत्-प्रभा-मण्डलं च बिभ्रती सा (सीता), भर्त्रा “शुद्धा” इति स्व-पुर्यै पुनः संदर्शिता वह्नि-गता इव रराज।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) स्फुरदिति॥ स्फुरत्प्रभामण्डलमानसूयमनसूयया दत्तं शाश्वतं सदातनमङ्गरागं बिभ्रती सा सीता भर्त्रा स्वपुर्यै शुद्धेति संदर्शिता पुनर्वह्निगतेव रराज ॥
Summary AI Wearing the eternal cosmetic unguent and radiant halo given by Anasuya, Sita shone brightly. It was as if her husband was again demonstrating her purity to their city, just as he had done through the fire ordeal.
सारांश AI अनसूया के दिव्य अंगराग से चमकती सीता ऐसी लग रही थीं मानो राम ने अग्नि-परीक्षा के बाद उनकी शुद्धता को पुनः नगरवासियों के समक्ष प्रस्तुत किया हो।
पदच्छेदः AI
स्फुरत्प्रभामण्डलम्स्फुरत्प्रभामण्डल (२.१) a radiant halo
आनसूयम्आनसूय (२.१) given by Anasuya
सातद् (१.१) She (Sita)
बिभ्रतीबिभ्रती (√भृ+शतृ, १.१) wearing
शाश्वतम्शाश्वत (२.१) eternal
अङ्गरागम्अङ्गराग (२.१) cosmetic unguent
रराजरराज (√राज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) she shone
शुद्धाशुद्ध (१.१) pure
इतिइति thus
पुनःपुनर् again
स्वपुर्यैस्वपुरी (४.१) to her own city
संदर्शितासंदर्शित (सम्√दृश्+णिच्+क्त, १.१) shown
वह्निगतावह्नि–गता (१.१) one who has entered the fire
इवइव as if
भर्त्राभर्तृ (३.१) by her husband
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
स्फु त्प्र भा ण्ड मा सू यं
सा ब्रि भ्र ती शा श्व ङ्ग रा गम्
रा शु द्धे ति पु नः स्व पु र्यै
सं र्शि ता ह्नि ते र्त्रा
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