सौमित्रिणा तदनु संससृजे स चैन
मुत्थाप्य नम्रशिरसं भृशमालिलिङ्ग ।
रूदेन्द्रजित्प्रहरणव्रणकर्कशेन
क्लिश्यन्निवास्य भुजमध्यमुरःस्थलेन ॥
सौमित्रिणा तदनु संससृजे स चैन
मुत्थाप्य नम्रशिरसं भृशमालिलिङ्ग ।
रूदेन्द्रजित्प्रहरणव्रणकर्कशेन
क्लिश्यन्निवास्य भुजमध्यमुरःस्थलेन ॥
मुत्थाप्य नम्रशिरसं भृशमालिलिङ्ग ।
रूदेन्द्रजित्प्रहरणव्रणकर्कशेन
क्लिश्यन्निवास्य भुजमध्यमुरःस्थलेन ॥
अन्वयः
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तत्-अनु सः (भरतः) सौमित्रिणा च संससृजे। (सौमित्रिः) नम्र-शिरसम् एनम् उत्थाप्य, रूढ-इन्द्रजित्-प्रहरण-व्रण-कर्कशेन अस्य उरः-स्थलेन भुज-मध्यम् क्लिश्यन् इव, भृशम् आलिलिङ्ग।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सौमित्रिणेति॥ तदनु सुग्रीवादिवन्दनानन्तरं स भरतः सौमित्रिणा संससृजे संगतः।
सृज विसर्गेदैवादिकात्कर्तरि लिट्। नम्रशिरसं प्रणतमेनं सौमित्रिमुत्थाप्य भृशं गाढमालिलिङ्ग च। किं कुर्वन्? रूढेन्द्रजित्प्रहरणव्रणैः कर्कशेनास्य सौमित्रेरुरःस्थलेन भुजमध्यं स्वकीयं क्सिश्यन्निव पीडयन्निव। क्लिश्नातिरयं सकर्मकः। क्लिश्नाति भुवनत्रयम्इति दर्शनात्। ननु रामायणे-ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीं च परंतपः। किमर्थं ज्यैष्ठ्यमवलम्ब्यानार्जवेन श्लोको व्याख्यातः? सत्यम्, -किंतु रामायणश्लोकार्थष्टीकाकृतोक्तः श्रूयताम्। ततो लक्ष्मणमासाद्य-`इत्यादिश्लोक आसादनं लक्ष्मणवैदेह्योः। अभिवादनं तु वैदेह्या एव। अन्यथा पूर्वोक्तं भरतस्य ज्यैष्ठ्यं विरुध्येतेति ॥
Summary
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After that, Bharata greeted Lakshmana. Lakshmana, raising Bharata whose head was bowed, embraced him tightly, as if causing pain to Bharata's chest with his own, which was rough with the healed scars from Indrajit's weapons.
सारांश
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इसके बाद भरत ने लक्ष्मण को उठाकर गले लगाया। लक्ष्मण की छाती, जो इंद्रजित के अस्त्रों के घावों से कठोर हो गई थी, भरत के सीने से लगकर उन्हें सुखद स्पर्श दे रही थी।
पदच्छेदः
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| सौमित्रिणा | सौमित्रि (३.१) | with Lakshmana |
| तदनु | तद्-अनु | after that |
| संससृजे | संससृजे (सम्√सृज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | met |
| सः | तद् (१.१) | he (Bharata) |
| च | च | and |
| एनम् | एनद् (२.१) | him (Bharata) |
| उत्थाप्य | उत्थाप्य (उद्√स्था+ल्यप्) | raising |
| नम्रशिरसम् | नम्र–शिरस् (२.१) | him whose head was bowed |
| भृशम् | भृशम् | tightly |
| आलिलिङ्ग | आलिलिङ्ग (आ√लिङ्ग् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | embraced |
| रूदेन्द्रजित्प्रहरणव्रणकर्कशेन | रूढ–इन्द्रजित्–प्रहरण–व्रण–कर्कश (३.१) | by (his) chest, rough with healed scars from Indrajit's weapons |
| क्लिश्यन् | क्लिश्यत् (√क्लिश्+शतृ, १.१) | as if causing pain |
| इव | इव | as if |
| अस्य | इदम् (६.१) | his (Bharata's) |
| भुजमध्यम् | भुज–मध्य (२.१) | chest |
| उरःस्थलेन | उरस्–स्थल (३.१) | with his chest |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सौ | मि | त्रि | णा | त | द | नु | सं | स | सृ | जे | स | चै | न |
| मु | त्था | प्य | न | म्र | शि | र | सं | भृ | श | मा | लि | लि | ङ्ग |
| रू | दे | न्द्र | जि | त्प्र | ह | र | ण | व्र | ण | क | र्क | शे | न |
| क्लि | श्य | न्नि | वा | स्य | भु | ज | म | ध्य | मु | रः | स्थ | ले | न |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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