अन्वयः
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तीरनिखातयूपा या (सरयूः) तुरंगमेध-अवभृथ-अवतीर्णैः इक्ष्वाकुभिः पुण्यतरीकृतानि जलानि राजधानीम् अयोध्याम् अनु वहति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
जलालीति॥ यूपः संस्कृतः पशुबन्धनार्हो दारुविशेषः। तीरनिखातयूपा या सरयूस्तुरंगमेधा अश्वमेधास्तेष्ववभृथार्थमेवावतीर्णैरवरूढैरिक्ष्वाकुभिरिक्ष्वाकुगोत्रापत्यैर्नः पूर्वैः। तद्राजत्वादणो लुक्। पुण्यतरीकृतान्यतिशयेन पुण्यानि कृतानि जलान्ययोध्यां राजधानीं नगरीमनु समीपे, तया लक्षितयेत्यर्थः।
अनुशब्दस्य लक्षणेत्थंभूत- (अष्टाध्यायी १.४.९० ) इत्यादिना कर्मप्रवचनीयत्वात्तद्योगे द्वितीया। वहति प्रापयति ॥
Summary
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The Sarayu river, on whose banks sacrificial posts are fixed, flows alongside the capital city Ayodhya, carrying waters made even more sacred by the Ikshvaku kings who descended into them for the purificatory bath after their horse sacrifices.
सारांश
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यह सरयू नदी अयोध्या राजधानी के पास बहती है, जिसके तटों पर यज्ञ स्तंभ गड़े हैं और इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने अश्वमेध यज्ञ के अंत में स्नान कर इसे अत्यंत पवित्र बना दिया है।
पदच्छेदः
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| जलानि | जल (२.३) | waters |
| या | यद् (१.१) | which |
| तीरनिखातयूपा | तीर–निखात–यूप (१.१) | she who has sacrificial posts fixed on her banks |
| वहति | वहति (√वह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | flows |
| अयोध्याम् | अयोध्या (२.१) | Ayodhya |
| अनु | अनु | along |
| राजधानीम् | राजधानी (२.१) | the capital |
| तुरंगमेधावभृथावतीर्णैः | तुरंगमेध–अवभृथ–अवतीर्ण (अव√तृ+क्त, ३.३) | by those who descended for the purificatory bath after a horse-sacrifice |
| इक्ष्वाकुभिः | इक्ष्वाकु (३.३) | by the Ikshvakus |
| पुण्यतरीकृतानि | पुण्यतरी–कृत (√कृत+क्त+च्वि, २.३) | made more holy |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | ला | नि | या | ती | र | नि | खा | त | यू | पा |
| व | ह | त्य | यो | ध्या | म | नु | रा | ज | धा | नीम् |
| तु | रं | ग | मे | धा | व | भृ | था | व | ती | र्णै |
| रि | क्ष्वा | कु | भिः | पु | ण्य | त | री | कृ | ता | नि |
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