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यः सततं परिपृच्छति शृणोति सन्धारयत्यनिशम् ।
तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विवर्धते बुद्धिः ॥

अन्वयः AI यः सततम् परिपृच्छति शृणोति अनिशम् सन्धारयति तस्य बुद्धिः दिवाकर-किरणैः नलिनी इव विवर्धते ।
Summary AI The intellect of one who constantly asks questions, listens, and reflects grows like a lotus blooming under the rays of the sun.
सारांश AI जो निरंतर प्रश्न पूछता है, ध्यान से सुनता है और सदा धारण करता है, उसकी बुद्धि सूर्य की किरणों से कमलिनी की भांति विकसित होती है।
पदच्छेदः AI
यःयद् (१.१) who
सततंसतत constantly
परिपृच्छतिपरिपृच्छति (परि√प्रछ् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) inquires
शृणोतिशृणोति (√श्रु कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) listens
सन्धारयतिसन्धारयति (सम्√धृ +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) retains/holds firmly
अनिशम्अनिश constantly
तस्यतद् (६.१) his
दिवाकर-किरणैःदिवाकरकिरण (३.३) by sun's rays
नलिनीनलिनी (१.१) lotus
इवइव like
विवर्धतेविवर्धते (वि√वृध् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) grows/develops
बुद्धिःबुद्धि (१.१) intellect
छन्दः उपगीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
१०
यः तं रि पृ च्छ ति
शृ णो ति न्धा त्य नि शम्
स्य दि वा कि णै
र्न लि नी वि र्ध ते बु द्धिः
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