अन्वयः
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नित्यम् दान-परः राजा इह कीर्तिम् अवाप्य च तत्-प्रभावात् पुनः स्वर्गे त्रिदशैः सह स्पर्धते ॥
Summary
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A king who is constantly charitable attains fame in this world and, by that influence, later competes with the gods in heaven.
सारांश
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सदैव दान देने वाला राजा इस लोक में कीर्ति प्राप्त करता है और अपने पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में देवताओं के साथ स्पर्धा करता है।
पदच्छेदः
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| राजा | राजन् (१.१) | king |
| दानपरः | दान–पर (१.१) | devoted to charity |
| नित्यम् | नित्य | constantly |
| इह | इह | here |
| कीर्तिम् | कीर्ति (२.१) | fame |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| च | च | and |
| तत्प्रभावात् | तत्–प्रभाव (५.१) | from its power |
| पुनः | पुनः | again |
| स्वर्गम् | स्वर्ग (२.१) | heaven |
| स्पर्धते | स्पर्धते (√स्पर्ध् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | competes |
| त्रिदशैः | त्रिदश (३.३) | with gods |
| सह | सह | with |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | जा | दा | न | प | रो | नि | त्य |
| मि | ह | की | र्ति | म | वा | प्य | च |
| त | त्प्र | भा | वा | त्पु | नः | स्व | र्गं |
| स्प | र्ध | ते | त्रि | द | शैः | स | ह |
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