वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं
जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम् ।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलः
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ॥

अन्वयः AI व्याघ्र-गज-आदि-सेवितम् जनेन हीनम् बहु-कण्टक-आवृतम् वनम् वरम् तृणानि शय्या (वरा) परिधान-वल्कलः (वरः) बन्धु-मध्ये धन-हीन-जीवितम् न (वरम्) ॥
Summary AI It is better to live in a forest inhabited by tigers and elephants, devoid of people and covered with thorns, using grass as a bed and bark as clothing, than to live impoverished among one's kinsmen.
सारांश AI बाघ-हाथियों से भरे, कांटों वाले निर्जन वन में रहना, घास पर सोना और छाल पहनना श्रेष्ठ है, परंतु बंधु-बांधवों के बीच निर्धन होकर जीना उचित नहीं।
पदच्छेदः AI
वरम्वरम् better
वनम्वन (१.१) forest
व्याघ्र-गजादि-सेवितम्व्याघ्रगजआदिसेवित (√सेव्+क्त, १.१) frequented by tigers, elephants, etc.
जनेनजन (३.१) by people
हीनम्हीन (√हा+क्त, १.१) devoid of
बहु-कण्टकावृतम्बहुकण्टकआवृत (√आवृ+क्त, १.१) covered with many thorns
तृणानितृण (१.३) grasses
शय्याशय्या (१.१) bed
परिधान-वल्कलःपरिधानवल्कल (१.१) bark as clothing
not
बन्धु-मध्येबन्धुमध्य (७.१) among relatives
धन-हीन-जीवितम्धनहीन (√हा+क्त)जीवित (१.१) life devoid of wealth
छन्दः वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२
रं नं व्या घ्र जा दि से वि तं
ने ही नं हु ण्ट का वृ तम्
तृ णा नि य्या रि धा ल्क लः
न्धु ध्ये ही जी वि तम्
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