शत्रुमुन्मूलयेत्प्राज्ञस्तीक्ष्णं तीक्ष्णेन शत्रुणा ।
व्यथाकरं सुखार्थाय कण्टकेनैव कण्टकम् ॥

अन्वयः AI प्राज्ञः सुख-अर्थाय व्यथा-करम् तीक्ष्णम् शत्रुम् तीष्णेन शत्रुणा एव उन्मूलयेत्, (यथा) कण्टकेन एव कण्टकम् (उन्मूल्यते) ।
Summary AI For the sake of happiness, a wise man should uproot a painful and sharp enemy with another sharp enemy, just as one removes a thorn with another thorn.
सारांश AI बुद्धिमान को एक शत्रु का नाश दूसरे शत्रु से करना चाहिए, जैसे पैर में चुभे कांटे को दूसरे कांटे से निकालकर सुख प्राप्त किया जाता है।
पदच्छेदः AI
शत्रुम्शत्रु (२.१) enemy
उन्मूलयेत्उन्मूलयेत् (उत्√मूल् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) one should uproot
प्राज्ञःप्राज्ञ (१.१) a wise person
तीक्ष्णम्तीक्ष्ण (२.१) fierce
तीक्ष्णेनतीक्ष्ण (३.१) by a fierce
शत्रुणाशत्रु (३.१) enemy
व्यथा-करम्व्यथाकर (२.१) pain-causing
सुखार्थायसुखअर्थ (४.१) for the sake of happiness
कण्टकेनैवकण्टक (३.१)एव by a thorn alone
कण्टकम्कण्टक (२.१) thorn
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
त्रु मु न्मू ये त्प्रा ज्ञ
स्ती क्ष्णं ती क्ष्णे त्रु णा
व्य था रं सु खा र्था
ण्ट के नै ण्ट कम्
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