अन्वयः
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यस्य तेजः तेजस्वि-तेजसाम् जातु शमनं न (भवति) । तेन मातुः यौवन-हारिणा वृथा जातेन किम् ॥
Summary
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What is the use of a man being born merely to rob his mother of her youth, if his own brilliance never manages to surpass the brilliance of other powerful men?
सारांश
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जिस राजा का प्रताप अन्य तेजस्वियों के तेज को शांत न कर सके, उसका जन्म व्यर्थ है; उसने केवल अपनी माता के यौवन को नष्ट किया है।
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| जातु | जातु | ever |
| शमनम् | शमन (१.१) | subduing |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| तेजः | तेजस् (१.१) | splendor |
| तेजस्वि-तेजसाम् | तेजस्विन्–तेजस् (६.३) | of the splendor of the powerful |
| वृथा | वृथा | in vain |
| जातेन | जात (√जन्+क्त, ३.१) | born |
| किम् | किम् | what |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| मातुः | मातृ (६.१) | of the mother |
| यौवन-हारिणा | यौवन–हारिन् (√हारिन्+णिनि, ३.१) | who steals youth |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | जा | तु | श | म | नं | य | स्य |
| ते | ज | स्ते | ज | स्वि | ते | ज | साम् |
| वृ | था | जा | ते | न | किं | ते | न |
| मा | तु | र्यौ | व | न | हा | रि | णा |
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