तीक्ष्णोपायप्राप्तिगम्योऽपि योऽर्थ-
स्तस्याप्यादौ संश्रयः साधु युक्तः ।
उत्तुङ्गाग्रः सारभूतो वनानां
मान्याभ्यर्च्य च्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥
तीक्ष्णोपायप्राप्तिगम्योऽपि योऽर्थ-
स्तस्याप्यादौ संश्रयः साधु युक्तः ।
उत्तुङ्गाग्रः सारभूतो वनानां
मान्याभ्यर्च्य च्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥
स्तस्याप्यादौ संश्रयः साधु युक्तः ।
उत्तुङ्गाग्रः सारभूतो वनानां
मान्याभ्यर्च्य च्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥
अन्वयः
AI
यः अर्थः तीक्ष्ण-उपाय-प्राप्ति-गम्यः अपि (अस्ति), तस्य अपि आदौ संश्रयः साधु युक्तः । वनानाम् सार-भूतः उत्तुङ्ग-अग्रः पादप-इन्द्रः मान्य-अभ्यर्च्य च्छिद्यते ॥
Summary
AI
Even for a goal attainable through harsh means, seeking refuge first is proper. The mighty king of trees in the forest, though strong and tall, is only cut down after being duly honored and worshipped.
सारांश
AI
जो कार्य कठोर उपायों से सिद्ध हो सकता हो, उसमें भी पहले आश्रय लेना उचित है। वनों के सबसे ऊँचे और श्रेष्ठ वृक्ष को भी विधिपूर्वक पूजने के बाद ही काटा जाता है।
पदच्छेदः
AI
| तीक्ष्णोपाय-प्राप्ति-गम्यः | तीक्ष्ण–उपाय–प्राप्ति–गम्य (१.१) | attainable by sharp means |
| अपि | अपि | even if |
| यः | यद् (१.१) | which |
| अर्थः | अर्थ (१.१) | purpose/object |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| अपि | अपि | even |
| आदौ | आदि (७.१) | in the beginning |
| संश्रयः | संश्रय (१.१) | resort/support |
| साधु | साधु | properly |
| युक्तः | युक्त (√युज्+क्त, १.१) | joined/appropriate |
| उत्तुङ्गाग्रः | उत्तुङ्ग–अग्र (१.१) | having a very high top |
| सार-भूतः | सार–भूत (१.१) | essential/substantive |
| वनानाम् | वन (६.३) | of forests |
| मान्याभ्यर्च्य | मान्य–अभ्यर्च्य (अभि√अर्च्+ल्यप्) | having honored and worshipped |
| छिद्यते | छिद्यते (√छिद् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is cut |
| पादपेन्द्रः | पादप–इन्द्र (१.१) | king of trees |
छन्दः
शालिनी [११: मततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ती | क्ष्णो | पा | य | प्रा | प्ति | ग | म्यो | ऽपि | यो | ऽर्थ |
| स्त | स्या | प्या | दौ | सं | श्र | यः | सा | धु | यु | क्तः |
| उ | त्तु | ङ्गा | ग्रः | सा | र | भू | तो | व | ना | नां |
| मा | न्या | भ्य | र्च्य | च्छि | द्य | ते | पा | द | पे | न्द्रः |
| म | त | त | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.