यद्वा तद्वा विषमपतितः साधु वा गर्हितं वा
कालापेक्षी हृदयनिहितं बुद्धिमान्कर्म कुर्यात् ।
किं गाण्डीवस्फुरदुरुगुणास्फालनक्रूरपाणि-
र्नासील्लीलानटनविलसन्मेखली सव्यसाची ॥
यद्वा तद्वा विषमपतितः साधु वा गर्हितं वा
कालापेक्षी हृदयनिहितं बुद्धिमान्कर्म कुर्यात् ।
किं गाण्डीवस्फुरदुरुगुणास्फालनक्रूरपाणि-
र्नासील्लीलानटनविलसन्मेखली सव्यसाची ॥
कालापेक्षी हृदयनिहितं बुद्धिमान्कर्म कुर्यात् ।
किं गाण्डीवस्फुरदुरुगुणास्फालनक्रूरपाणि-
र्नासील्लीलानटनविलसन्मेखली सव्यसाची ॥
अन्वयः
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विषम-पतितः बुद्धिमान् काल-अपेक्षी हृदय-निहितं यत् वा तत् वा साधु वा गर्हितं वा कर्म कुर्यात् । गाण्डीव-स्फुरत्-उरु-गुण-आस्फालन-क्रूर-पाणिः सव्यसाची लीला-नटन-विलसन्-मेखली न आसीत् किम् ?
Summary
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A wise man in adversity should, while awaiting his time, perform any action—noble or despised—to achieve his goal. Was Arjuna, whose hands were calloused from pulling the Gāṇḍīva bow's string, not seen wearing a tinkling girdle while dancing in disguise?
सारांश
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संकट में पड़ा बुद्धिमान व्यक्ति समय की प्रतीक्षा करते हुए हृदय में लक्ष्य रख कर उचित-अनुचित कार्य करता है; जैसे गांडीवधारी अर्जुन नर्तक बनकर कमरबंद पहन कर रहे थे।
पदच्छेदः
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| यत् | यद् (१.१) | whatever |
| वा | वा | or |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| वा | वा | or |
| विषम-पतितः | विषम–पतित (१.१) | fallen into difficulty |
| साधु | साधु (१.१) | good |
| वा | वा | or |
| गर्हितं | गर्हित (√गर्ह्+क्त, १.१) | condemned |
| वा | वा | or |
| कालापेक्षी | काल–अपेक्षिन् (१.१) | awaiting the right time |
| हृदय-निहितं | हृदय–निहित (२.१) | placed in the heart |
| बुद्धिमान् | बुद्धिमत (१.१) | wise person |
| कर्म | कर्मन् (२.१) | action/task |
| कुर्यात् | कुर्यात् (√कृ कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should do |
| किं | किं | why/what |
| गाण्डीव-स्फुरद्-उरु-गुणास्फालन-क्रूर-पाणिः | गाण्डीव–स्फुरत्–उरु–गुण–आस्फालन–क्रूर–पाणि (१.१) | whose hands were rough from twanging the mighty string of the Gandiva bow |
| न | न | not |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| लीला-नटन-विलसन्मेखली | लीला–नटन–विलसत्–मेखलिन् (१.१) | adorned with a glittering girdle while dancing playfully |
| सव्यसाची | सव्यसाचिन् (१.१) | Arjuna |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | द्वा | त | द्वा | वि | ष | म | प | ति | तः | सा | धु | वा | ग | र्हि | तं | वा |
| का | ला | पे | क्षी | हृ | द | य | नि | हि | तं | बु | द्धि | मा | न्क | र्म | कु | र्यात् |
| किं | गा | ण्डी | व | स्फु | र | दु | रु | गु | णा | स्फा | ल | न | क्रू | र | पा | णि |
| र्ना | सी | ल्ली | ला | न | ट | न | वि | ल | स | न्मे | ख | ली | स | व्य | सा | ची |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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