अन्वयः
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यस्य यस्य हि फलितस्य कार्यस्य विशेषतः क्षिप्रम् अक्रियमाणस्य, कालः तत् फलम् पिबति ।
Summary
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When a task—especially one bearing fruit—is not performed promptly, time itself consumes the benefit or result of that action.
सारांश
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जिस कार्य के फलित होने का समय आ गया हो, यदि उसे शीघ्र न किया जाए, तो समय उस कार्य के फल को पी जाता है अर्थात् नष्ट कर देता है।
पदच्छेदः
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| यस्य | यद् (६.१) | of which |
| यस्य | यद् (६.१) | of which |
| हि | हि | indeed |
| कार्यस्य | कार्य (६.१) | of the task |
| फलितस्य | फलित (√फल्+क्त, ६.१) | that has borne fruit |
| विशेषतः | विशेषतः | especially |
| क्षिप्रम् | क्षिप्र | quickly |
| अक्रियमाणस्य | अक्रियमाण (√कृ+शानच्, ६.१) | of that which is not being done |
| कालः | काल (१.१) | time |
| पिबति | पिबति (√पा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | drinks |
| तत्-फलम् | तत्–फल (२.१) | that fruit |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्य | य | स्य | हि | का | र्य | स्य |
| फ | लि | त | स्य | वि | शे | ष | तः |
| क्षि | प्र | म | क्रि | य | मा | ण | स्य |
| का | लः | पि | ब | ति | त | त्फ | लम् |
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