अन्वयः
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यत् अस्य विहितम् भोज्यम्, तत् तस्य न प्रदुष्यति । अभक्ष्ये बहु-दोषः स्यात्, तस्मात् व्यत्ययः न कार्यः ।
Summary
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Whatever food is prescribed for a creature does not cause it harm. Eating forbidden food leads to many faults; therefore, one should not deviate from the prescribed order.
सारांश
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जिसके लिए जो भोजन शास्त्रसम्मत है, वह उसके लिए दोषपूर्ण नहीं है। अभक्ष्य भोजन में बहुत दोष होता है, इसलिए इस प्राकृतिक व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
पदच्छेदः
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| यत् | यद् (१.१) | whatever |
| यस्य | यद् (६.१) | of whom/which |
| विहितम् | विहित (वि√धा+क्त, १.१) | prescribed |
| भोज्यम् | भोज्य (√भुज्+ण्यत्, १.१) | food |
| न | न | not |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| तस्य | तद् (६.१) | of him/it |
| प्रदुष्यति | प्रदुष्यति (प्र√दुष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes corrupted/harmful |
| अभक्ष्ये | अभक्ष्य (७.१) | in what is not to be eaten |
| बहु-दोषः | बहु–दोष (१.१) | many faults |
| स्यात् | स्यात् (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may be |
| तस्मात् | तस्मात् | therefore |
| कार्यः | कार्य (√कृ+ण्यत्, १.१) | to be done |
| न | न | not |
| व्यत्ययः | व्यत्यय (१.१) | transgression/violation |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | द्य | स्य | वि | हि | तं | भो | ज्यं |
| न | त | त्त | स्य | प्र | दु | ष्य | ति |
| अ | भ | क्ष्ये | ब | हु | दो | षः | स्या |
| त्त | स्मा | त्का | र्यो | न | व्य | त्य | यः |
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