अन्वयः
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ये जन्तवः परस्परस्य मर्माणि न रक्षन्ति, ते एव वल्मीक-उदर-सर्प-वत् निधनम् यान्ति ।
Summary
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Those creatures who do not protect each other's vulnerabilities meet their destruction, just like snakes living inside an anthill.
सारांश
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जो प्राणी एक-दूसरे के रहस्यों या कमजोरियों की रक्षा नहीं करते, वे बाम्बी के भीतर रहने वाले साँपों की तरह स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं।
पदच्छेदः
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| परस्परस्य | परस्पर (६.१) | of each other |
| मर्माणि | मर्मन् (२.३) | vital points |
| ये | यद् (१.३) | who |
| न | न | not |
| रक्षन्ति | रक्षन्ति (√रक्ष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | protect |
| जन्तवः | जन्तु (१.३) | creatures |
| ते | तद् (१.३) | they |
| एव | एव | indeed |
| निधनम् | निधन (२.१) | destruction |
| यान्ति | यान्ति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | attain |
| वल्मीकोदर-सर्पवत् | वल्मीक–उदर–सर्प | like a snake in the belly of an anthill |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | र | स्प | र | स्य | म | र्मा | णि |
| ये | न | र | क्ष | न्ति | ज | न्त | वः |
| त | ए | व | नि | ध | नं | या | न्ति |
| व | ल्मी | को | द | र | स | र्प | वत् |
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