अन्वयः
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कश्चित् सहस्रम् भरते, अन्यः शतम्, अपरः दश, तु अकृत-पुण्यस्य क्षुद्रस्य मम आत्मा अपि दुर्भरः।
Summary
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"One supports a thousand, another a hundred, and another ten. But for me, meritless and insignificant, even my own body is a burden."
सारांश
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कोई व्यक्ति हजारों का पालन करता है, कोई सौ का और कोई दस का; किंतु मुझ जैसे पुण्यहीन और क्षुद्र प्राणी के लिए अपना स्वयं का भरण-पोषण करना भी कठिन है।
पदच्छेदः
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| सहस्रम् | सहस्र (२.१) | thousand |
| भरते | भरते (√भृ कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | supports/maintains |
| कश्चित् | कश्चित् (१.१) | someone |
| शतम् | शत (२.१) | hundred |
| अन्यः | अन्य (१.१) | another |
| दश | दश (२.३) | ten |
| अपरः | अपर (१.१) | someone else |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| तु | तु | but |
| अकृत-पुण्यस्य | अकृत–पुण्य (६.१) | of one who has not accumulated merit |
| क्षुद्रस्य | क्षुद्र (६.१) | of the wretched/insignificant |
| आत्मा | आत्मन् (१.१) | self/body |
| अपि | अपि | even |
| दुर्भरः | दुर्भर (१.१) | difficult to maintain |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ह | स्रं | भ | र | ते | क | श्चि |
| च्छ | त | म | न्यो | द | शा | प | रः |
| म | म | त्व | कृ | त | पु | ण्य | स्य |
| क्षु | द्र | स्या | त्मा | पि | दु | र्भ | रः |
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