अन्वयः
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कान्त! अवहितः शृणुष्व यत् अहम् ते हितम् वक्ष्यामि । त्वया नित्यम् प्राणैः अपि शरणागतः संरक्ष्यः ।
Summary
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"O beloved, listen attentively to what beneficial thing I say to you. You must always protect one who has come for refuge, even at the cost of your life."
सारांश
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कबूतरी ने कहा, "हे प्रिय! सावधानी से मेरी हितकारी बात सुनें; अपनी शरण में आए हुए व्यक्ति की रक्षा आपको अपने प्राण देकर भी करनी चाहिए।"
पदच्छेदः
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| शृणुष्व | शृणुष्व (√श्रु कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | listen |
| अवहितः | अवहित (अव+हि√धा+क्त, १.१) | attentive |
| कान्त | कान्त (८.१) | beloved |
| यत् | यद् (२.१) | what |
| ते | युष्मद् (४.१) | to you |
| वक्ष्यामि | वक्ष्यामि (√वच् कर्तरि लृट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I will say |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| हितम् | हित (२.१) | beneficial |
| प्राणैः | प्राण (३.३) | by life |
| अपि | अपि | even |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| नित्यम् | नित्य | always |
| संरक्ष्यः | संरक्ष्य (सम्√रक्ष्+ण्यत्, १.१) | to be protected |
| शरणागतः | शरण–आगत (१.१) | one who has come for refuge |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शृ | णु | ष्वा | व | हि | तः | का | न्त |
| य | त्ते | व | क्ष्या | म्य | हं | हि | तम् |
| प्रा | णै | र | पि | त्व | या | नि | त्यं |
| सं | र | क्ष्यः | श | र | णा | ग | तः |
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