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मुहूर्तं पश्यते यावद्वियद्विमलतारकम् ।
प्राप्य वृक्षं वदत्येवं योऽत्र तिष्ठति कश्चन ॥

अन्वयः AI यावत् मुहूर्तम् विमल-तारकम् वियत् पश्यते, सः वृक्षम् प्राप्य एवं वदति - अत्र यः कश्चन तिष्ठति ।
Summary AI While looking at the sky filled with clear stars for a moment, he reached the tree and said: "Whoever is residing here..."
सारांश AI उस वृक्ष के पास पहुँचकर उसने कुछ पल निर्मल तारों वाले आकाश को देखा और फिर कहा कि यहाँ जो कोई भी निवास करता है, वह मेरी पुकार सुने।
पदच्छेदः AI
मुहूर्तम्मुहूर्तम् for a moment
पश्यतेपश्यते (√दृश् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) he sees
यावत्यावत् while
वियत्वियत् (२.१) the sky
विमल-तारकम्विमलतारक (२.१) with clear stars
प्राप्यप्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) having reached
वृक्षम्वृक्ष (२.१) the tree
वदतिवदति (√वद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) says
एवम्एवम् thus
यःयद् (१.१) whoever
अत्रअत्र here
तिष्ठतितिष्ठति (√स्था कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) dwells
कश्चनकश्चन someone
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
मु हू र्तं श्य ते या
द्वि द्वि ता कम्
प्रा प्य वृ क्षं त्ये वं
यो ऽत्र ति ष्ठ ति श्च
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