अन्वयः
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अपसार-समायुक्तम् दुर्गम् यज्ञैः न उच्यते । अपसार-परित्यक्तम् दुर्ग-व्याजेन बन्धनम् ।
Summary
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A fort equipped with an exit is not called a fort by sacrifices; however, a fort devoid of an exit is merely a prison under the pretext of being a fortress.
सारांश
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निकास मार्ग से युक्त स्थान ही वास्तव में दुर्ग कहलाता है। निकास विहीन दुर्ग तो किले के बहाने केवल एक कारागार या बंधन है।
पदच्छेदः
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| अपसार-समायुक्तम् | अपसार–समायुक्त (सम्√युज्+क्त, १.१) | endowed with means of retreat |
| न | न | not |
| यज्ञैः | यज्ञ (३.३) | by sacrifices |
| दुर्गम् | दुर्ग (१.१) | fortress |
| उच्यते | उच्यते (√वच् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is called |
| अपसार-परित्यक्तम् | अपसार–परित्यक्त (परि√त्यज्+क्त, १.१) | abandoned by means of retreat |
| दुर्ग-व्याजेन | दुर्ग–व्याज (३.१) | under the guise of a fort |
| बन्धनम् | बन्धन (१.१) | bondage, prison |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | प | सा | र | स | मा | यु | क्तं |
| न | य | ज्ञै | र्दु | र्ग | मु | च्य | ते |
| अ | प | सा | र | प | रि | त्य | क्तं |
| दु | र्ग | व्या | जे | न | ब | न्ध | नम् |
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