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उन्नम्योन्नम्य तत्रैव दरिद्राणां मनोरथाः ।
पतन्ति हृदये व्यर्था विधवास्त्रीस्तना इव ॥

अन्वयः AI दरिद्राणाम् मनोरथाः विधवा-स्त्री-स्तनाः इव तत्र एव उन्नम्य उन्नम्य हृदये व्यर्थाः पतन्ति ।
Summary AI The desires of the poor rise up repeatedly only to fall uselessly within their own hearts, like the sagging breasts of a widow.
सारांश AI निर्धन व्यक्तियों की इच्छाएँ उनके मन में ही उठकर वैसे ही व्यर्थ नष्ट हो जाती हैं, जैसे विधवा स्त्री के शारीरिक उभार का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता।
पदच्छेदः AI
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एवएव undefined
दरिद्राणांदरिद्र (६.३) undefined
मनोरथाःमनस्रथ (१.३) undefined
पतन्तिपतन्ति (√पत् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) undefined
हृदयेहृदय (७.१) undefined
व्यर्थाःव्यर्थ (१.३) undefined
विधवा-स्त्री-स्तनाःविधवास्त्रीस्तन (१.३) undefined
इवइव undefined
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
न्न म्यो न्न म्य त्रै
रि द्रा णां नो थाः
न्ति हृ ये व्य र्था
वि वा स्त्री स्त ना
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