अन्वयः
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यः अत्र मित्राणि करोति, कौटिल्येन न वर्तते, तैः समम् कथञ्चन पराभूतिम् न सम्प्राप्नोति।
Summary
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He who makes friends in this world and does not behave with duplicity never suffers defeat when he is accompanied by them.
सारांश
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जो व्यक्ति निष्कपट भाव से मित्र बनाता है और उनके साथ छल नहीं करता, वह कभी भी पराजय या अपमान का सामना नहीं करता।
पदच्छेदः
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| यो | यद् (१.१) | undefined |
| मित्राणि | मित्र (२.३) | undefined |
| करोत्यत्र | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.)–अत्र | makes here |
| न | न | undefined |
| कौटिल्येन | कौटिल्य (३.१) | undefined |
| वर्तते | वर्तते (√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | undefined |
| तैः | तद् (३.३) | undefined |
| समं | सम | undefined |
| न | न | undefined |
| पराबूतिं | पराबूति (२.१) | undefined |
| सम्प्राप्नोति | सम्प्राप्नोति (√सम्प्राप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | undefined |
| कथञ्चन | कथञ्चन | undefined |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यो | मि | त्रा | णि | क | रो | त्य | त्र |
| न | कौ | टि | ल्ये | न | व | र्त | ते |
| तैः | स | मं | न | प | रा | भू | तिं |
| स | म्प्रा | प्नो | ति | क | थ | ञ्च | न |
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