एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं
गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य ।
तावद्द्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥
एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं
गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य ।
तावद्द्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥
गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य ।
तावद्द्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥
अन्वयः
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यावत् अहम् अर्णवस्य पारम् इव एकस्य दुःखस्य अन्तम् न गच्छामि तावत् मे द्वितीयम् समुपस्थितम्। छिद्रेषु अनर्थाः बहुली-भवन्ति।
Summary
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Before I can reach the end of one sorrow, like reaching the shore of an ocean, a second one has arrived for me. Misfortunes truly multiply in vulnerable moments.
सारांश
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अभी एक दुःख समाप्त भी नहीं हुआ कि दूसरा सामने खड़ा है; वास्तव में कमजोरियों और संकटों में अनर्थ बढ़ जाते हैं।
पदच्छेदः
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| एकस्य | एक (६.१) | of one |
| दुःखस्य | दुःख (६.१) | of sorrow |
| न | न | not |
| यावत् | यावत् | as long as |
| अन्तम् | अन्त (२.१) | end |
| गच्छामि | गच्छामि (√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I go |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| पारम् | पार (२.१) | shore/end |
| इव | इव | like |
| अर्णवस्य | अर्णव (६.१) | of the ocean |
| तावत् | तावत् | then/so long |
| द्वितीयम् | द्वितीय (१.१) | second |
| समुपस्थितम् | स्था (सम्+उप√स्था, +क्त, १.१) | arisen/present |
| मे | अस्मद् (६.१) | to me/my |
| छिद्रेषु | छिद्र (७.३) | in weaknesses/holes |
| अनर्थाः | अनर्थ (१.३) | misfortunes |
| बहुली-भवन्ति | बहुली–भवन्ति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become numerous/multiply |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | क | स्य | दुः | ख | स्य | न | या | व | द | न्तं |
| ग | च्छा | म्य | हं | पा | र | मि | वा | र्ण | व | स्य |
| ता | व | द्द्वि | ती | यं | स | मु | प | स्थि | तं | मे |
| छि | द्रे | ष्व | न | र्था | ब | हु | ली | भ | व | न्ति |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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