अन्वयः
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यः सकृत् उक्तं न गृह्णाति वा स्वयं न करोति, यस्य संपुटिका न अस्ति, तस्य सुभाषितम् कुतः?
Summary
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How can he possess eloquent sayings who does not grasp what is said once, does not compose them himself, and lacks a collection of such verses?
सारांश
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जो व्यक्ति न तो दूसरों के सुभाषितों को ग्रहण करता है और न स्वयं उनकी रचना करता है, उसके पास ज्ञान का कोष नहीं होता।
पदच्छेदः
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| सकृत् | सकृत् | once |
| उक्तं | उक्त (√वच्+क्त, २.१) | said |
| न | न | not |
| गृह्णाति | गृह्णाति (√ग्रह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | accepts |
| स्वयं | स्वयम् | oneself |
| वा | वा | or |
| करोति | करोति (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | does |
| यः | यद् (१.१) | who |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| संपुटिका | संपुटिका (१.१) | small box (memory/understanding) |
| न | न | not |
| अस्ति | अस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is |
| कुतः | कुतः | whence |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| सुभाषितम् | सुभाषित (१.१) | good saying |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | कृ | दु | क्तं | न | गृ | ह्णा | ति |
| स्व | यं | वा | न | क | रो | ति | यः |
| य | स्य | सं | पु | टि | का | ना | स्ति |
| कु | त | स्त | स्य | सु | भा | षि | तम् |
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