अन्वयः
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येन अयशः प्राप्यते येन च अधो-गतिः भवेत् येन च स्व-अर्थात् भ्रश्यते तत् कर्म न समाचरेत् ।
Summary
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One should not perform an action that results in infamy, leads to a downward state, or causes a fall from one's own objectives.
सारांश
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जिस कार्य से अपयश मिले, जिससे अधोगति हो और जिससे अपने वास्तविक हित की हानि हो, मनुष्य को वैसा कर्म कभी नहीं करना चाहिए।
पदच्छेदः
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| अयशः | अयशस् (१.१) | disgrace |
| प्राप्यते | प्राप्यते (√प्राप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is obtained |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| चाधो-गतिर्भवेत् | च–अधस्–गति (१.१)–भवेत् (√भू कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | and downfall may be |
| स्वार्थाच्च | स्व–अर्थ (५.१)–च | and from one's own interest |
| भ्रश्यते | भ्रश्यते (√भ्रंश् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is deprived |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| तत्कर्म | तद् (२.१)–कर्मन् (२.१) | that action |
| न | न | not |
| समाचरेत् | समाचरेत् (सम्+आ√चर् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should perform |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | य | शः | प्रा | प्य | ते | ये | न |
| ये | न | चा | धो | ग | ति | र्भ | वेत् |
| स्वा | र्था | च्च | भ्र | श्य | ते | ये | न |
| त | त्क | र्म | न | स | मा | च | रेत् |
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