अन्वयः
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यः नरः स्व-वित्त-हरणं दृष्ट्वा हि असून् रक्षति तद्-दत्तं सलिल-अञ्जलिम् पितरः अपि न गृह्णन्ति ।
Summary
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If a man preserves his life after witnessing the seizure of his own wealth, even his ancestors do not accept the water oblation offered by him.
सारांश
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अपने धन का हरण होते देखकर भी जो मनुष्य कायरतावश अपने प्राणों को बचाता है, उसके पितर भी उसके द्वारा दिए गए जलांजलि को ग्रहण नहीं करते।
पदच्छेदः
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| स्व-वित्त-हरणम् | स्व–वित्त–हरण (२.१) | the taking away of one's own wealth |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| यः | यद् (१.१) | who |
| हि | हि | indeed |
| रक्षति | रक्षति (√रक्ष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | protects |
| असून् | असु (२.३) | lives |
| नरः | नर (१.१) | man |
| पितरः | पितृ (१.३) | ancestors |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| गृह्णन्ति | गृह्णन्ति (√ग्रह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | accept |
| तत्-दत्तम् | तद्–दत्त (√दा+क्त, २.१) | that which is given by him |
| सलिआञ्जलिम् | सलिल–अञ्जलि (२.१) | water offering |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | वि | त्त | ह | र | णं | दृ | ष्ट्वा |
| यो | हि | र | क्ष | त्य | सू | न्न | रः |
| पि | त | रो | ऽपि | न | गृ | ह्ण | न्ति |
| त | द्द | त्तं | स | लि | आ | ञ्ज | लिम् |
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