दैन्यस्य पात्रतामेति पराभृतेः परं पदम् ।
विपदामाश्रयः शश्वद्दौर्गत्यकलुषीकृतः ॥

अन्वयः AI दौर्गत्य-कलुषी-कृतः दैन्यस्य पात्रताम् एति परा-भूतेः परं पदम् शश्वत् विपदाम् आश्रयः ।
Summary AI One who is defiled by poverty becomes a vessel for misery, reaches the highest stage of defeat, and remains a constant refuge for misfortunes.
सारांश AI निर्धनता से कलुषित व्यक्ति दीनता का पात्र बन जाता है; वह तिरस्कार का मुख्य स्थान और निरंतर आने वाली विपत्तियों का आश्रय होता है।
पदच्छेदः AI
दैन्यस्यदैन्य (६.१) of wretchedness
पात्रताम्पात्रता (२.१) the state of being a vessel
एतिएति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) attains
पराभृतेःपराभूति (६.१) of humiliation
परंपर (२.१) highest
पदम्पद (२.१) state
विपदाम्विपद् (६.३) of misfortunes
आश्रयःआश्रय (१.१) abode
शश्वत्शश्वत् constantly
दौर्गत्य-कलुषी-कृतःदौर्गत्य–कलुषीकृत (√कलुषीकृ+क्त, १.१) tainted by poverty
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
दै न्य स्य पा त्र ता मे ति
रा भृ तेः रं दम्
वि दा मा श्र यः श्व
द्दौ र्ग त्य लु षी कृ तः
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