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सेवकः स्वामिनं द्वेष्टि कृपणं परुषाक्षरम् ।
आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥

अन्वयः AI यः सेवकः कृपणम् परुष-अक्षरम् स्वामिनम् द्वेष्टि सः आत्मानम् किम् न द्वेष्टि यः सेव्य-असेव्यम् न वेत्ति?
Summary AI A servant who hates a miserly and harsh-spoken master—does he not hate himself for not knowing whom to serve and whom not to serve?
सारांश AI सेवक अपने कंजूस और कठोर बोलने वाले स्वामी से द्वेष करता है, किंतु क्या उसे स्वयं से द्वेष नहीं करना चाहिए जो यह नहीं जानता कि किसकी सेवा करनी चाहिए और किसकी नहीं?
पदच्छेदः AI
सेवकःसेवक (१.१) servant
स्वामिनम्स्वामिन् (२.१) master
द्वेष्टिद्वेष्टि (√द्विष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) hates
कृपणम्कृपण (२.१) miserly
परुषाक्षरम्परुषअक्षर (२.१) harsh-speaking
आत्मानम्आत्मन् (२.१) oneself
किम्किम् why
सःतद् (१.१) he
not
द्वेष्टिद्वेष्टि (√द्विष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) hates
सेव्य-असेव्यम्सेव्यअसेव्य (२.१) what is worthy and unworthy of service
not
वेत्तिवेत्ति (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) knows
यःयद् (१.१) who
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
से कः स्वा मि नं द्वे ष्टि
कृ णं रु षा क्ष रम्
त्मा नं किं द्वे ष्टि
से व्या से व्यं वे त्ति यः
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