विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक् ।
यावद्व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥

अन्वयः AI मानवः तावत् विद्याम् वित्तम् शिल्पम् सम्यक् न आप्नोति, यावत् हृष्टः भूमौ देशात् देश-अन्तरम् न व्रजति ।
Summary AI A man cannot truly acquire knowledge, wealth, or specialized skills until he joyfully travels from one land to another across the earth.
सारांश AI जब तक मनुष्य प्रसन्नतापूर्वक एक देश से दूसरे देश की यात्रा नहीं करता, तब तक वह विद्या, धन और शिल्प को भली-भांति प्राप्त नहीं कर पाता।
पदच्छेदः AI
विद्याम्विद्या (२.१) knowledge
वित्तम्वित्त (२.१) wealth
शिल्पम्शिल्प (२.१) skill/craft
तावत्तावत् so long
not
आप्नोतिआप्नोति (√आप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) obtains
मानवःमानव (१.१) a human being
सम्यक्सम्यक् properly/completely
यावत्यावत् until
व्रजतिव्रजति (√व्रज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) goes/travels
not
भूमौभूमि (७.१) on the earth
देशात्देश (५.१) from one country
देशान्तरम्देशअन्तर (२.१) to another country
हृष्टःहृष्ट (√हृष्+क्त, १.१) delighted/joyfully
छन्दः आर्या []
छन्दोविश्लेषणम्
१०
वि द्यां वि त्तं शि ल्पं
ता न्ना प्नो ति मा वः म्यक्
या द्व्र ति भू मौ
दे शा द्दे शा न्त रं हृ ष्टः
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