अन्वयः
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यदि आत्मनः सिद्धिम् इच्छेत्, तर्हि विवेक-ज्ञः मुहुः विघ्नित-कर्माणम् पराजितम् द्यूत-कारम् न आलापयेत्।
Summary
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If one desires success, a person of discernment should not converse with a gambler who has lost or with someone whose works are repeatedly obstructed.
सारांश
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अपनी सफलता चाहने वाले विवेकशील मनुष्य को बार-बार असफल होने वाले और हारे हुए जुआरी से कभी वार्तालाप नहीं करना चाहिए।
पदच्छेदः
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| मुहुः | मुहुस् | repeatedly |
| विघ्नित-कर्माणम् | विघ्नित (√विघ्नित+क्त)–कर्मन् (२.१) | whose actions are repeatedly obstructed/failed |
| द्यूत-कारम् | द्यूत–कार (२.१) | a gambler |
| पराजितम् | पराजित (परा√जि+क्त, २.१) | defeated |
| न | न | not |
| आलापयेत् | आलापयेत् (आ√लप् +णिच् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should converse with |
| विवेक-ज्ञः | विवेक–ज्ञ (१.१) | a discerning person |
| यदि | यदि | if |
| इच्छेत् | इच्छेत् (√इष् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should desire |
| सिद्धिम् | सिद्धि (२.१) | success |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | of oneself |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | हु | र्वि | घ्नि | त | क | र्मा | णं |
| द्यू | त | का | रं | प | रा | जि | तम् |
| ना | ला | प | ये | द्वि | वे | क | ज्ञो |
| य | दी | च्छे | त्सि | द्धि | मा | त्म | नः |
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