धर्मार्थं यततामपीह विपदो देवाद्यदि स्युः क्वचि-
त्तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः कार्यो विशेषान्नयः ।
लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो
दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्भवः ॥
धर्मार्थं यततामपीह विपदो देवाद्यदि स्युः क्वचि-
त्तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः कार्यो विशेषान्नयः ।
लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो
दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्भवः ॥
त्तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः कार्यो विशेषान्नयः ।
लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो
दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्भवः ॥
अन्वयः
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इह धर्म-अर्थं यतताम् अपि यदि क्वचित् दैवात् विपदः स्युः, तत् तासाम् उपशान्तये सुमतिभिः विशेषान् नयः कार्यः। यतः अत्र सकले लोके एषा लोकोक्तिः ख्यातिम् उपागता, वह्निना दग्धानां तस्य उद्भवः सेकः अपि हित-करः किल।
Summary
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If calamities strike those striving for dharma and wealth due to fate, the wise must apply special strategy to pacify them. As the famous proverb says, for those burnt by fire, the remedy is indeed the application of water.
सारांश
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दैवीय विपदा आने पर बुद्धिमानों को विशेष नीति अपनानी चाहिए, क्योंकि अग्नि से जले के लिए जल का सेक ही हितकारी होता है।
पदच्छेदः
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| धर्मार्थं | धर्म–अर्थ (२.१) | for the sake of righteousness |
| यतताम् | यतत् (√यत्+शतृ, ६.३) | of those striving |
| अपि | अपि | even |
| इह | इह | here/in this world |
| विपदः | विपद् (१.३) | calamities |
| देवात् | देव (५.१) | from fate/gods |
| यदि | यदि | if |
| स्युः | स्युः (√अस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | should be/occur |
| क्वचित् | क्वचित् | sometimes |
| तत् | तत् | then |
| तासाम् | तत् (६.३) | of them (calamities) |
| उपशान्तये | उपशान्ति (४.१) | for the appeasement |
| सुमतिभिः | सुमति (३.३) | by the wise |
| कार्यः | कार्य (√कृ+ण्यत्, १.१) | to be done |
| विशेषान् | विशेष (५.१) | especially |
| नयः | नय (१.१) | policy/strategy |
| लोके | लोक (७.१) | in the world |
| ख्यातिम् | ख्याति (२.१) | fame/reputation |
| उपागता | उपागत (उप+आ√गम्+क्त, १.१) | attained |
| अत्र | अत्र | here |
| सकले | सकल (७.१) | entire |
| लोकोक्तिः | लोक–उक्ति (१.१) | popular saying/proverb |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| यतः | यतः | because |
| दग्धानां | दग्ध (√दह्+क्त, ६.३) | of those burnt |
| किल | किल | indeed/it is said |
| वह्निना | वह्नि (३.१) | by fire |
| हित-करः | हित–कर (१.१) | beneficial |
| सेकः | सेक (१.१) | sprinkling/irrigation |
| अपि | अपि | even |
| तस्य | तत् (६.१) | of it (fire) |
| उद्भवः | उद्भव (उद्√भू+, १.१) | origin/source |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध | र्मा | र्थं | य | त | ता | म | पी | ह | वि | प | दो | दे | वा | द्य | दि | स्युः | क्व | चि |
| त्त | त्ता | सा | मु | प | शा | न्त | ये | सु | म | ति | भिः | का | र्यो | वि | शे | षा | न्न | यः |
| लो | के | ख्या | ति | मु | पा | ग | ता | त्र | स | क | ले | लो | को | क्ति | रे | षा | य | तो |
| द | ग्धा | नां | कि | ल | व | ह्नि | ना | हि | त | क | रः | से | को | ऽपि | त | स्यो | द्भ | वः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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