अन्वयः
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ये दुरात्मानः महीभुजः दुराराध्याः इति प्राहुः, तैः निजानि प्रमाद-आलस्य-जाड्यानि ख्यापितानि।
Summary
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Those wicked souls who claim that kings are difficult to please only reveal their own negligence, laziness, and stupidity.
सारांश
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जो लोग राजाओं की सेवा को कठिन बताते हैं, वे वास्तव में अपनी अकर्मण्यता, आलस्य और मूर्खता को ही उजागर करते हैं।
पदच्छेदः
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| ये | यद् (१.३) | who |
| च | च | and |
| प्राहुः | प्राहुः (प्र√ब्रू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | say |
| दुरात्मानो | दुर्–आत्मन् (१.३) | wicked souls |
| दुराराध्या | दुर्–आ–राध्य (१.३) | difficult to please |
| महीभुजः | मही–भुज् (१.३) | kings |
| प्रमादालस्य-जाड्यानि | प्रमाद–आलस्य–जाड्य (१.३) | negligence, laziness, and dullness |
| ख्यापितानि | ख्यापित (√ख्या+णिच्+क्त, १.३) | revealed |
| निजानि | निज (१.३) | their own |
| तैः | तद् (३.३) | by them |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ये | च | प्रा | हु | र्दु | रा | त्मा | नो |
| दु | रा | रा | ध्या | म | ही | भु | जः |
| प्र | मा | दा | ल | स्य | जा | ड्या | नि |
| ख्या | पि | ता | नि | नि | जा | नि | तैः |
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