अन्वयः
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ये जात्य-आदि-महोत्साहान् नरेन्द्रान् न उपयान्ति च, तेषाम् आ-मरणं भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम्।
Summary
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For those who do not approach kings of high birth and great energy, begging until death is ordained as their penance.
सारांश
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जो लोग अहंकारवश राजा का आश्रय नहीं लेते, उनके लिए जीवन भर भिक्षा माँगना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।
पदच्छेदः
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| ये | यद् (१.३) | who |
| जात्य्-आदि-महोत्साहात् | जाति–आदि–महा–उत्साह (५.१) | due to great pride in birth etc. |
| नरेन्द्रान् | नर–इन्द्र (२.३) | kings |
| न | न | not |
| उपयान्ति | उपयान्ति (उप√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | approach |
| च | च | and |
| तेषाम् | तद् (६.३) | for them |
| आमरणम् | आ–मरण (२.१) | lifelong |
| भिक्षा | भिक्षा (१.१) | begging |
| प्रायश्चित्तम् | प्रायश्चित्त (१.१) | atonement |
| विनिर्मितम् | विनिर्मित (वि+निर्√मा+क्त, १.१) | has been prescribed |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ये | जा | त्या | दि | म | हो | त्सा | हा |
| न्न | रे | न्द्रा | न्नो | प | या | न्ति | च |
| ते | षा | मा | म | र | णं | भि | क्षा |
| प्रा | य | श्चि | त्तं | वि | नि | र्मि | तम् |
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