अन्वयः
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ये सेवकाः कोप-प्रसाद-वस्तूनि विचिन्वन्ति, ते धुन्वन्तम् अपि पार्थिवं पश्चात् शनैः आरोहन्ति।
Summary
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Servants who carefully observe the causes of a king's anger and favor gradually master even a difficult and wavering monarch.
सारांश
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जो सेवक राजा के क्रोध और प्रसन्नता के कारणों को भली-भाँति पहचान लेते हैं, वे धीरे-धीरे कठिन स्वभाव वाले राजा को भी वश में कर लेते हैं।
पदच्छेदः
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| कोप-प्रसाद-वस्तूनि | कोप–प्रसाद–वस्तु (२.३) | causes of anger and favor |
| ये | यद् (१.३) | who |
| विचिन्वन्ति | विचिन्वन्ति (वि√चि कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | discern |
| सेवकाः | सेवक (१.३) | servants |
| आरोहन्ति | आरोहन्ति (आ√रुह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | ascend |
| शनैः | शनैस् | gradually |
| पश्चात् | पश्चात् | afterwards |
| धुन्वन्तम् | धुन्वत् (√धुन्+शतृ, २.१) | shaking off |
| अपि | अपि | even |
| पार्थिवम् | पार्थिव (२.१) | the king |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| को | प | प्र | सा | द | व | स्तू | नि |
| ये | वि | चि | न्व | न्ति | से | व | काः |
| आ | रो | ह | न्ति | श | नैः | प | श्चा |
| द्धु | न्व | न्त | म | पि | पा | र्थि | वम् |
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