अन्वयः
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येन आपदि उपकृतं येन च विषमासु दशासु हसितं, तयोः उभयोः उपकृत्य पुनः अपि जातं नरं मन्ये ।
Summary
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I consider a man to be truly reborn only after he has requited both the one who helped him in times of distress and the one who mocked him during his misfortunes.
सारांश
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विपत्ति में उपकार करने वाले और बुरे समय में उपहास करने वाले, इन दोनों का ही प्रत्युपकार करने वाला व्यक्ति ही वास्तविक मनुष्य है।
पदच्छेदः
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| आपदि | आपद् (७.१) | in calamity/distress |
| येन | यद् (३.१) | by whom |
| उपकृतम् | उपकृत (उप√कृ+क्त, १.१) | helped/benefited |
| येन | यद् (३.१) | by whom |
| च | च | and |
| हसितम् | हसित (√हस्+क्त, १.१) | laughed |
| दशासु | दशा (७.३) | in circumstances/states |
| विषमासु | विषम (७.३) | difficult/adverse |
| उपकृत्य | उपकृत्य (उप√कृ+ल्यप्) | having helped/benefited |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| उभयोः | उभ (६.२) | of both |
| पुनः | पुनः | again |
| अपि | अपि | even |
| जातम् | जात (√जन्+क्त, २.१) | born |
| नरम् | नर (२.१) | person |
| मन्ये | मन्ये (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I consider/think |
छन्दः
आर्या []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | प | दि | ये | नो | प | कृ | तं | |||||
| ये | न | च | ह | सि | तं | द | शा | सु | वि | ष | मा | सु |
| उ | प | कृ | त्य | त | यो | रु | भ | योः | ||||
| पु | न | र | पि | जा | तं | न | रं | म | न्ये |
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