अन्वयः
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यः महताम् अपराध्येत् सः दूर-स्थः अस्मि इति न अश्वसेत् । बुद्धिमतः बाहू दीर्घौ भवतः ताभ्यां हिंसकम् हिंसति ॥
Summary
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One who offends the great should not feel secure thinking they are far away. The arms of a wise and powerful person are long; with them, he strikes down those who cause him harm.
सारांश
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महान व्यक्ति का अपराध करके यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं दूर हूँ; बुद्धिमानों की पहुँच बहुत दूर तक होती है और वे अपने शत्रुओं को कहीं भी खोजकर दंड दे सकते हैं।
पदच्छेदः
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| महताम् | महत् (६.३) | of great persons |
| यः | यद् (१.१) | who |
| अपराध्येन | अपराध्य (३.१) | by an offender |
| दूरस्थोऽस्मीति | –– | thinking 'I am far away' |
| न | न | not |
| आश्वसेत् | आश्वसेत् (आ√श्वस् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | should trust |
| दीर्घौ | दीर्घ (१.२) | long |
| बुद्धिमतो | बुद्धिमत् (६.१) | of the intelligent one |
| बाहू | बाहु (१.२) | arms |
| ताभ्याम् | तद् (३.२) | by them |
| हिंसति | हिंसति (√हिंस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | harms |
| हिंसकम् | हिंसक (२.१) | the harmer |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | ह | तां | यो | ऽप | रा | ध्ये | न |
| दू | र | स्थो | ऽस्मी | ति | ना | श्व | सेत् |
| दी | र्घौ | बु | द्धि | म | तो | बा | हू |
| ता | भ्यां | हिं | स | ति | हिं | स | कम् |
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