अन्वयः
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यः भक्ति-समन्वितः भृत्यः स्वामी-अर्थे प्राणान् त्यजेत् सः जरा-मरण-वर्जितं परं पदं आप्नोति।
Summary
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A devoted servant who sacrifices his life for the sake of his master attains the highest state, which is free from old age and death.
सारांश
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जो भक्तिवान सेवक अपने स्वामी के हित के लिए प्राणों का उत्सर्ग करता है, वह जन्म-मरण से मुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है।
पदच्छेदः
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| स्वामि-अर्थे | स्वामिन्–अर्थ (७.१) | for the sake of the master |
| यः | यद् (१.१) | who |
| त्यजेत् | त्यजेत् (√त्यज् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would abandon |
| प्राणान् | प्राण (२.३) | lives |
| भक्ति-समन्वितः | भक्ति–समन्वित (१.१) | endowed with devotion |
| सः | तद् (१.१) | he |
| परम् | पर (२.१) | supreme |
| पदम् | पद (२.१) | state, abode |
| आप्नोति | आप्नोति (√आप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtains |
| जरा-मरण-वर्जितम् | जरा–मरण–वर्जित (२.१) | devoid of old age and death |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वा | म्य | र्थे | य | स्त्य | जे | त्प्रा | णा |
| न्भृ | त्यो | भ | क्ति | स | म | न्वि | तः |
| स | प | रं | प | द | मा | प्नो | ति |
| ज | रा | म | र | ण | व | र्जि | तम् |
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