तच्छ्रुत्वा शृगाल आह-स्वामिन्यद्यभयप्रदानं दत्त्वा वधः क्रियते तदेष दोषो भवति
पुनर्यदि देवपादानां भक्त्या सात्मनो जीवितव्यं प्रयच्छति तन्न दोषः
ततो यदि स स्वयमेवात्मानं वधाय नियोजयति तद्वध्योऽन्यथास्माकं मध्यादेकतमो वध्य इति यतो देवपादाः पथ्याशिनः क्षुन्निरोधादन्त्यां दशां यास्यन्ति
तत्किमेतैः प्राणैरस्माकं ये स्वाम्यर्थे न यास्यन्ति
अपरं पश्चादप्यस्माभिर्वह्नि-प्रवेशः कार्यो यदि स्वामि-पादानां किंचिदनिष्टं भविष्यति
उक्तं च- यस्मिन्कुले यः पुरुषः प्रधानः स सर्व-यत्नैः परिरक्षणीयः
तस्मिन्विनष्टे स्व-कुलं विनष्टं न नाभि-भङ्गे ह्यरका वहन्ति
तच्छ्रुत्वा शृगाल आह-स्वामिन्यद्यभयप्रदानं दत्त्वा वधः क्रियते तदेष दोषो भवति
पुनर्यदि देवपादानां भक्त्या सात्मनो जीवितव्यं प्रयच्छति तन्न दोषः
ततो यदि स स्वयमेवात्मानं वधाय नियोजयति तद्वध्योऽन्यथास्माकं मध्यादेकतमो वध्य इति यतो देवपादाः पथ्याशिनः क्षुन्निरोधादन्त्यां दशां यास्यन्ति
तत्किमेतैः प्राणैरस्माकं ये स्वाम्यर्थे न यास्यन्ति
अपरं पश्चादप्यस्माभिर्वह्नि-प्रवेशः कार्यो यदि स्वामि-पादानां किंचिदनिष्टं भविष्यति
उक्तं च- यस्मिन्कुले यः पुरुषः प्रधानः स सर्व-यत्नैः परिरक्षणीयः
तस्मिन्विनष्टे स्व-कुलं विनष्टं न नाभि-भङ्गे ह्यरका वहन्ति
पुनर्यदि देवपादानां भक्त्या सात्मनो जीवितव्यं प्रयच्छति तन्न दोषः
ततो यदि स स्वयमेवात्मानं वधाय नियोजयति तद्वध्योऽन्यथास्माकं मध्यादेकतमो वध्य इति यतो देवपादाः पथ्याशिनः क्षुन्निरोधादन्त्यां दशां यास्यन्ति
तत्किमेतैः प्राणैरस्माकं ये स्वाम्यर्थे न यास्यन्ति
अपरं पश्चादप्यस्माभिर्वह्नि-प्रवेशः कार्यो यदि स्वामि-पादानां किंचिदनिष्टं भविष्यति
उक्तं च- यस्मिन्कुले यः पुरुषः प्रधानः स सर्व-यत्नैः परिरक्षणीयः
तस्मिन्विनष्टे स्व-कुलं विनष्टं न नाभि-भङ्गे ह्यरका वहन्ति
अन्वयः
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यस्मिन् कुले यः पुरुषः प्रधानः सः सर्व-यत्नैः परिरक्षणीयः तस्मिन् विनष्टे स्व-कुलं विनष्टं हि नाभि-भङ्गे अरकाः न वहन्ति।
Summary
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The leading person in a family must be protected with every effort. If he perishes, the entire family perishes, just as the spokes of a wheel cannot function if the nave is broken.
सारांश
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सेवक ने कहा कि यदि वह स्वयं प्राण दे तो दोष नहीं। कुल के प्रधान की रक्षा अनिवार्य है, क्योंकि उसके नष्ट होने पर पूरा वंश बिखर जाता है।
पदच्छेदः
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| तत् | तद् (२.१) | that |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु+क्त्वा) | having heard |
| शृगालः | शृगाल (१.१) | the jackal |
| आह | आह | said |
| स्वामिन् | स्वामिन् (८.१) | O Master! |
| यदि | यदि | if |
| अभय-प्रदानम् | अभय–प्रदान (२.१) | assurance of safety |
| दत्त्वा | दत्त्वा (√दा+क्त्वा) | having given |
| वधः | वध (१.१) | killing |
| क्रियते | क्रियते (√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is done |
| तत् | तद् | then |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| दोषः | दोष (१.१) | fault |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | occurs |
| पुनः | पुनर् | again |
| यदि | यदि | if |
| देव-पादानाम् | देव–पाद (६.३) | of your highness |
| भक्त्या | भक्ति (३.१) | with devotion |
| सः | तद् (१.१) | he |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | of himself |
| जीवितव्यम् | जीवितव्य (√जीव्+तव्य, २.१) | life |
| प्रयच्छति | प्रयच्छति (प्र√यम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gives |
| तत् | तद् | then |
| न | न | not |
| दोषः | दोष (१.१) | fault |
| ततः | ततस् | therefore |
| यदि | यदि | if |
| सः | तद् (१.१) | he |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| एव | एव | indeed |
| आत्मानम् | आत्मन् (२.१) | himself |
| वधाय | वध (४.१) | for killing |
| नियोजयति | नियोजयति (नि√युज् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | employs |
| तत् | तद् | then |
| वध्यः | वध्य (१.१) | fit to be killed |
| अन्यथा | अन्यथा | otherwise |
| अस्माकम् | अस्मद् (६.३) | of us |
| मध्यात् | मध्य (५.१) | from among |
| एकतमः | एकतम (१.१) | one of them |
| वध्यः | वध्य (१.१) | fit to be killed |
| इति | इति | thus |
| यतः | यतस् | because |
| देव-पादाः | देव–पाद (१.३) | your highness |
| पथ्याशिनः | पथ्य–आशिन् (१.३) | eaters of proper food |
| क्षुत्-निरोधात् | क्षुत्–निरोध (५.१) | from hunger suppression |
| अन्त्याम् | अन्त्य (२.१) | final |
| दशाम् | दशा (२.१) | state |
| यास्यन्ति | यास्यन्ति (√या कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | will go |
| तत् | तद् | therefore |
| किम् | किम् | what (is the use) |
| एतैः | एतद् (३.३) | by these |
| प्राणैः | प्राण (३.३) | lives |
| अस्माकम् | अस्मद् (६.३) | of us |
| ये | यद् (१.३) | who |
| स्वामि-अर्थे | स्वामिन्–अर्थ (७.१) | for the sake of the master |
| न | न | not |
| यास्यन्ति | यास्यन्ति (√या कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | will be sacrificed |
| अपरम् | अपर | moreover |
| पश्चात् | पश्चात् | afterwards |
| अपि | अपि | even |
| अस्माभिः | अस्मद् (३.३) | by us |
| वह्नि-प्रवेशः | वह्नि–प्रवेश (१.१) | entering fire |
| कार्यः | कार्य (√कृ+ण्यत्, १.१) | should be done |
| यदि | यदि | if |
| स्वामि-पादानाम् | स्वामिन्–पाद (६.३) | of your highness |
| किञ्चित् | किञ्चित् | something |
| अनिष्टम् | अनिष्ट (१.१) | undesirable |
| भविष्यति | भविष्यति (√भू कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will happen |
| उक्तम् | उक्त (√वच्+क्त, १.१) | said |
| च | च | and |
| यस्मिन् | यद् (७.१) | in which |
| कुले | कुल (७.१) | family |
| यः | यद् (१.१) | who |
| पुरुषः | पुरुष (१.१) | person |
| प्रधानः | प्रधान (१.१) | chief |
| सः | तद् (१.१) | he |
| सर्व-यत्नैः | सर्व–यत्न (३.३) | with all efforts |
| परिरक्षणीयः | परिरक्षणीय (परि√रक्ष्+अनीयर्, १.१) | should be protected |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in him |
| विनष्टे | विनष्ट (वि√नश्+क्त, ७.१) | destroyed |
| स्व-कुलम् | स्व–कुल (१.१) | one's own family |
| विनष्टम् | विनष्ट (वि√नश्+क्त, १.१) | destroyed |
| न | न | not |
| नाभि-भङ्गे | नाभि–भङ्ग (७.१) | when the hub is broken |
| हि | हि | indeed |
| अरकाः | अरक (१.३) | spokes |
| वहन्ति | वहन्ति (√वह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | carry, function |
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