प्रभोः प्रसादमन्यस्य न सहन्तीह सेवकाः ।
सपत्न्य इव सङ्क्रुद्धाः सपत्न्याः सुकृतैरपि ॥

अन्वयः AI इह सेवकाः अन्यस्य प्रभोः प्रसादं न सहन्ते सङ्क्रुद्धाः सपत्न्यः सपत्न्याः सुकृतैः इव।
Summary AI In this world, servants cannot tolerate the master's favor toward another, just as angry co-wives cannot endure the good fortune or virtues of a rival wife.
सारांश AI सेवक अपने स्वामी की दूसरे सेवकों पर कृपा सहन नहीं कर पाते। वे सौतों की तरह एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्यालु और क्रोधित रहते हैं।
पदच्छेदः AI
प्रभोःप्रभु (६.१) of the master
प्रसादम्प्रसाद (२.१) favor
अन्यस्यअन्य (६.१) of another
not
सहन्तिसहन्ति (√सह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) tolerate
इहइह here
सेवकाःसेवक (१.३) servants
सपत्न्यःसपत्नी (१.३) co-wives
इवइव like
सङ्क्रुद्धाःसङ्क्रुद्ध (सम्√क्रुध्+क्त, १.३) enraged
सपत्न्याःसपत्नी (६.१) of a co-wife
सुकृतैःसुकृत (३.३) by good deeds
अपिअपि even
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
प्र भोः प्र सा न्य स्य
न्ती से काः
त्न्य ङ्क्रु द्धाः
त्न्याः सु कृ तै पि
About

Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.