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भावस्निग्धैरुपकृतमपि द्वेष्यतां याति लोके
साक्षादन्यैरपकृतमपि प्रीतये चोपयाति ।
दुर्ग्राह्यत्वान्नृपतिमनसां नैकभावाश्रयाणां
सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ॥

अन्वयः AI लोके भाव-स्निग्धैः उपकृतं अपि द्वेष्यतां याति अन्यैः साक्षात् अपकृतं अपि प्रीतये च उपयाति नैक-भाव-आश्रयाणां नृपति-मनसां दुर्ग्राह्यत्वात् सेवा-धर्मः परम-गहनः योगिनां अपि अगम्यः।
Summary AI In this world, kindness from the affectionate can lead to hatred, while harm from others may result in affection. Because the minds of kings are multi-faceted and difficult to grasp, the duty of service is profoundly deep and incomprehensible even to yogīs.
सारांश AI राजाओं का मन अत्यंत चंचल और समझना कठिन होता है, इसलिए सेवा-धर्म योगियों के लिए भी अगम्य है। संसार में कभी प्रेमवश किया उपकार भी बुरा लगता है और कभी अपकार भी प्रिय हो जाता है।
पदच्छेदः AI
भाव-स्निग्धैःभावस्निग्ध (३.३) by affectionate people
उपकृतमउपकृत (उप√कृ+क्त, २.१) a favor done
अपिअपि even
द्वेष्यतांद्वेष्यता (२.१) hatred
यातियाति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) goes to
लोकेलोक (७.१) in the world
साक्षात्साक्षात् directly
अन्यैरअन्य (३.३) by others
अपकृतमअपकृत (अप√कृ+क्त, २.१) harm done
अपिअपि even
प्रीतयेप्रीति (४.१) for affection
चोपयाति–उपयाति (उप√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) and comes
दुर्ग्राह्यत्वान्नृपति-मनसांदुर्ग्राह्यत्व (५.१)नृपतिमनस् (६.३) due to the incomprehensibility of kings' minds
नैक-भावाश्रयाणांएकभावआश्रय (६.३) which are based on various dispositions
सेवा-धर्मःसेवाधर्म (१.१) the duty of service
परम-गहनोपरमगहन (१.१) extremely profound
योगिनामप्यगम्यःयोगिन् (६.३)अपिअगम्य (१.१) inaccessible even to yogis
छन्दः मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७
भा स्नि ग्धै रु कृ पि द्वे ष्य तां या ति लो के
सा क्षा न्यै कृ पि प्री ये चो या ति
दु र्ग्रा ह्य त्वा न्नृ ति सां नै भा वा श्र या णां
से वा र्मः नो यो गि ना प्य म्यः
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