निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रशाम्यति ।
अकारणद्वेषपरो हि यो भवे-
त्कथं नरस्तं परितोषयिष्यति ॥
निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रशाम्यति ।
अकारणद्वेषपरो हि यो भवे-
त्कथं नरस्तं परितोषयिष्यति ॥
ध्रुवं स तस्यापगमे प्रशाम्यति ।
अकारणद्वेषपरो हि यो भवे-
त्कथं नरस्तं परितोषयिष्यति ॥
अन्वयः
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यः हि निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति, सः तस्य अपगमे ध्रुवम् प्रशाम्यति, (किन्तु) यः अकारण-द्वेष-परः भवेत्, नरः तम् कथम् परितोषयिष्यति?
Summary
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He who becomes angry for a specific reason surely calms down when that reason is removed. But how can a person satisfy one who is intent on causeless hatred?
सारांश
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किसी कारण से उपजा क्रोध कारण हटने पर शांत हो जाता है, किंतु जो अकारण ही द्वेष रखता है, उसे कोई कभी संतुष्ट नहीं कर सकता।
पदच्छेदः
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| निमित्तम् | निमित्त (२.१) | a reason |
| उद्दिश्य | उद्दिश्य (उत्√दिश्+ल्यप्) | having aimed at |
| हि | हि | indeed |
| यः | यद् (१.१) | who |
| प्रकुप्यति | प्रकुप्यति (प्र√कुप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | gets angry |
| ध्रुवं | ध्रुव | certainly |
| स | तद् (१.१) | he |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| अपगमे | अपगम (७.१) | upon removal |
| प्रशाम्यति | प्रशाम्यति (प्र√शम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | calms down |
| अकारण-द्वेष-परो | अकारण–द्वेष–पर (१.१) | hostile without cause |
| हि | हि | indeed |
| यो | यद् (१.१) | who |
| भवेत् | भवेत् (√भू कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | might be |
| कथं | कथम् | how |
| नरस्तं | नर (१.१)–तद् (२.१) | a person him |
| परितोषयिष्यति | परितोषयिष्यति (परि√तुष् +णिच् कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will satisfy |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | मि | त्त | मु | द्दि | श्य | हि | यः | प्र | कु | प्य | ति |
| ध्रु | वं | स | त | स्या | प | ग | मे | प्र | शा | म्य | ति |
| अ | का | र | ण | द्वे | ष | प | रो | हि | यो | भ | वे |
| त्क | थं | न | र | स्तं | प | रि | तो | ष | यि | ष्य | ति |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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