नाश्नाति स्वच्छयोत्सुक्याद्विनिद्रो न प्रबुध्यते ।
न निःशङ्कं वचो ब्रूते सेवकोऽप्यत्र जीवति ॥

अन्वयः AI (सेवकः) स्वच्छया उत्सुक्यात् न अश्नाति, विनिद्रः (सन्) न प्रबुध्यते, निःशङ्कम् वचः न ब्रूते, अत्र अपि सेवकः जीवति।
Summary AI A servant does not eat according to his own desire, does not wake up even when sleepless by his own will, and does not speak fearlessly; yet, the servant lives in this condition.
सारांश AI सेवक न अपनी इच्छा से खा पाता है, न नींद आने पर सो पाता है और न ही निडर होकर बोल पाता है, फिर भी वह जीवित रहता है।
पदच्छेदः AI
not
अश्नातिअश्नाति (√अश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) eats
स्वच्छयास्वच्छा (३.१) by one's own will
उत्सुक्यात्उत्सुक्य (५.१) from eagerness
विनिद्रःविनिद्र (१.१) sleepless
not
प्रबुध्यतेप्रबुध्यते (प्र√बुध् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) wakes up
not
निःशङ्कंनिःशङ्क (२.१) fearlessly
वचःवचस् (२.१) word
ब्रूतेब्रूते (√ब्रू कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) speaks
सेवकःसेवक (१.१) servant
अपिअपि even
अत्रअत्र here
जीवतिजीवति (√जीव् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) lives
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
ना श्ना ति स्व च्छ यो त्सु क्या
द्वि नि द्रो प्र बु ध्य ते
निः ङ्कं चो ब्रू ते
से को ऽप्य त्र जी ति
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