अपरं मयानेक-मानुषाणामनेक-विधानि रुधिराण्यास्वादितान्याहार-दोषात्कटु-तिक्त-कषायाम्ल-रसास्वादानि न च कदाचिन्मधुर-रक्तं समास्वादितम्
तद्यदि त्वं प्रसादं करोषि तदस्य नृपतेर्विविध-व्यञ्जनान्न-पान-चोष्य-लेह्य-स्वाद्व्-आहार-वशादस्य शरीरे यन्मिष्टं रक्तं संजातं तद्-आस्वादनेन सौख्यं सम्पादयामि जिह्वाया इति ।
उक्तं च- रङ्कस्य नृपतेर्वापि जिह्वा-सौख्यं समं स्मृतम्
तन्-मात्रं च स्मृतं सारं तद्-अर्थं यतते जनः ॥
अपरं मयानेक-मानुषाणामनेक-विधानि रुधिराण्यास्वादितान्याहार-दोषात्कटु-तिक्त-कषायाम्ल-रसास्वादानि न च कदाचिन्मधुर-रक्तं समास्वादितम्
तद्यदि त्वं प्रसादं करोषि तदस्य नृपतेर्विविध-व्यञ्जनान्न-पान-चोष्य-लेह्य-स्वाद्व्-आहार-वशादस्य शरीरे यन्मिष्टं रक्तं संजातं तद्-आस्वादनेन सौख्यं सम्पादयामि जिह्वाया इति ।
उक्तं च- रङ्कस्य नृपतेर्वापि जिह्वा-सौख्यं समं स्मृतम्
तन्-मात्रं च स्मृतं सारं तद्-अर्थं यतते जनः ॥
तद्यदि त्वं प्रसादं करोषि तदस्य नृपतेर्विविध-व्यञ्जनान्न-पान-चोष्य-लेह्य-स्वाद्व्-आहार-वशादस्य शरीरे यन्मिष्टं रक्तं संजातं तद्-आस्वादनेन सौख्यं सम्पादयामि जिह्वाया इति ।
उक्तं च- रङ्कस्य नृपतेर्वापि जिह्वा-सौख्यं समं स्मृतम्
तन्-मात्रं च स्मृतं सारं तद्-अर्थं यतते जनः ॥
अन्वयः
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रङ्कस्य वा अपि नृपतेः जिह्वा-सौख्यम् समम् स्मृतम्। तत्-मात्रम् च सारम् स्मृतम्, तत्-अर्थम् जनः यतते।
Summary
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Whether for a beggar or a king, the pleasure of the tongue is the same. This sensory satisfaction is considered the essence of life, for which every person strives.
सारांश
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राजा और दरिद्र दोनों के लिए जिह्वा का स्वाद ही मुख्य है, जिसके लिए मनुष्य निरंतर प्रयत्नशील रहता है।
पदच्छेदः
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| अपरम् | अपर | furthermore |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| अनेक-मानुषाणाम् | अनेक–मानुष (६.३) | of many humans |
| अनेक-विधानि | अनेक–विध (२.३) | of many kinds |
| रुधिराणि | रुधिर (२.३) | bloods |
| आस्वादितानि | आस्वादित (√आस्वादित+क्त, २.३) | tasted |
| आहार-दोषात् | आहार–दोष (५.१) | due to defect in food |
| कटु-तिक्त-कषायाम्ल-रसास्वादानि | कटु–तिक्त–कषाय–अम्ल–रस–आस्वाद (२.३) | having tastes of pungent, bitter, astringent, sour |
| न | न | not |
| च | च | and |
| कदाचित् | कदाचित् | ever |
| मधुर-रक्तम् | मधुर–रक्त (२.१) | sweet blood |
| समास्वादितम् | समास्वादित (√समास्वादित+क्त, २.१) | tasted |
| तत् | तद् | therefore |
| यदि | यदि | if |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| प्रसादम् | प्रसाद (२.१) | favor |
| करोषि | करोषि (√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do |
| तत् | तद् | then |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this |
| नृपतेः | नृपति (६.१) | of the king |
| विविध-व्यञ्जनान्न-पान-चोष्य-लेह्य-स्वाद्व्-आहार-वशात् | विविध–व्यञ्जन–अन्न–पान–चोष्य–लेह्य–स्वादु–आहार–वश (५.१) | due to the influence of various dishes, food, drinks, chewables, lickables, and sweet food |
| अस्य | इदम् (६.१) | of his |
| शरीरे | शरीर (७.१) | in the body |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| मिष्टम् | मिष्ट (१.१) | sweet |
| रक्तम् | रक्त (१.१) | blood |
| संजातम् | संजात (√संजात+क्त, १.१) | produced |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| आस्वादनेन | आस्वादन (३.१) | by tasting |
| सौख्यम् | सौख्य (२.१) | happiness |
| सम्पादयामि | सम्पादयामि (सम्√पद् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I will produce |
| जिह्वायाः | जिह्वा (६.१) | of the tongue |
| इति | इति | thus |
| उक्तम् | उक्त (√उक्त+क्त, १.१) | said |
| च | च | and |
| रङ्कस्य | रङ्क (६.१) | of a poor man |
| नृपतेः | नृपति (६.१) | of a king |
| वा | वा | or |
| अपि | अपि | even |
| जिह्वा-सौख्यम् | जिह्वा–सौख्य (१.१) | tongue's pleasure |
| समम् | सम (१.१) | equal |
| स्मृतम् | स्मृत (√स्मृत+क्त, १.१) | considered |
| तन्-मात्रम् | तद्–मात्र (१.१) | that alone |
| च | च | and |
| स्मृतम् | स्मृत (√स्मृत+क्त, १.१) | considered |
| सारम् | सार (१.१) | essence |
| तद्-अर्थम् | तद्–अर्थ | for that purpose |
| यतते | यतते (√यत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | strives |
| जनः | जन (१.१) | people |
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