अन्वयः
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अनेक-दोष-दुष्टस्य कायः कस्य न वल्लभः? यः व्यलीकानि कुर्वन् अपि प्रियः, सः प्रियः एव (भवति)।
Summary
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To whom is the body, though defiled by many faults, not dear? Similarly, one who is beloved remains beloved even while committing offensive acts.
सारांश
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जैसे अनेक दोषों के बाद भी अपना शरीर सबको प्यारा होता है, वैसे ही प्रिय व्यक्ति अपराध करने पर भी प्रिय ही बना रहता है।
पदच्छेदः
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| अनेकदोषदुष्टस्य | अनेक–दोष–दुष्ट (६.१) | of one afflicted with many faults |
| कायः | काय (१.१) | body |
| कस्य | किम् (६.१) | whose |
| न | न | not |
| वल्लभः | वल्लभ (१.१) | dear |
| कुर्वन् | कुर्वत् (√कृ+शतृ, १.१) | doing |
| अपि | अपि | even |
| व्यलीकानि | व्यलीक (२.३) | wrongs |
| यः | यद् (१.१) | who |
| प्रियः | प्रिय (१.१) | dear |
| प्रियः | प्रिय (१.१) | dear |
| एव | एव | indeed |
| सः | तद् (१.१) | he |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | क | दो | ष | दु | ष्ट | स्य |
| का | यः | क | स्य | न | व | ल्ल | भः |
| कु | र्व | न्न | पि | व्य | ली | का | नि |
| यः | प्रि | यः | प्रि | य | ए | व | सः |
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