अन्वयः
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लोक-अनुग्रह-कर्तारः नर-ईश्वराः प्रवर्धन्ते लोकानाम् सङ्क्षयात् च एव क्षयम् यान्ति (अत्र) संशयः न ॥
Summary
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Kings who bestow favors upon their subjects prosper, whereas they undoubtedly meet their downfall when their subjects suffer decline or perish.
सारांश
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प्रजा पर कृपा करने वाले राजाओं की उन्नति होती है, और प्रजा के विनाश से वे स्वयं भी निश्चित रूप से नष्ट हो जाते हैं।
पदच्छेदः
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| लोकानुग्रह-कर्तारः | लोक–अनुग्रह–कर्तृ (१.३) | benefactors of the people |
| प्रवर्धन्ते | प्रवर्धन्ते (प्र√वृध् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | prosper/flourish |
| नरेश्वराः | नर–ईश्वर (१.३) | kings |
| लोकानाम् | लोक (६.३) | of the people |
| सङ्क्षयात् | सङ्क्षय (५.१) | from the decline/destruction |
| च | च | and |
| एव | एव | indeed |
| क्षयम् | क्षय (२.१) | decline/destruction |
| यान्ति | यान्ति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | go/attain |
| न | न | not |
| संशयः | संशय (१.१) | doubt |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लो | का | नु | ग्र | ह | क | र्ता | रः |
| प्र | व | र्ध | न्ते | न | रे | श्व | राः |
| लो | का | नां | स | ङ्क्ष | या | च्चै | व |
| क्ष | यं | या | न्ति | न | सं | श | यः |
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