अन्वयः
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सर्पाणाम् च खलानाम् च पर-द्रव्य-अपहारिणाम् अभिप्रायाः न सिध्यन्ति तेन इदम् जगत् वर्तते ॥
Summary
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The world continues to exist only because the malicious intentions of snakes, wicked people, and thieves do not always succeed.
सारांश
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सर्पों, दुष्टों और पराया धन हरने वालों के बुरे संकल्प यदि सफल नहीं होते, इसी कारण यह संसार टिका हुआ है।
पदच्छेदः
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| सर्पाणाम् | सर्प (६.३) | of snakes |
| च | च | and |
| खलानाम् | खल (६.३) | of wicked people |
| च | च | and |
| परद्रव्यापहारिणाम् | पर–द्रव्य–अपहारिन् (६.३) | of those who steal others' property |
| अभिप्रायाः | अभिप्राय (१.३) | intentions |
| न | न | not |
| सिध्यन्ति | सिध्यन्ति (√सिध् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | succeed |
| तेन | तद् (३.१) | by that |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| वर्तते | वर्तते (√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | exists/continues |
| जगत् | जगत् (१.१) | world |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र्पा | णां | च | ख | ला | नां | च |
| प | र | द्र | व्या | प | हा | रि | णाम् |
| अ | भि | प्रा | या | न | सि | ध्य | न्ति |
| ते | ने | दं | व | र्त | ते | ज | गत् |
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